भारत की विदेश नीति : आक्रामक दावों के पीछे छिपती कूटनीतिक विफलताएँ
प्रस्तावना : आत्मप्रचार बनाम अंतरराष्ट्रीय यथार्थ
पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति को लेकर एक विशेष प्रकार का आत्मविश्वासी और आक्रामक नैरेटिव गढ़ा गया है। सरकारी वक्तव्यों, समर्थक मीडिया और सोशल मीडिया अभियानों के ज़रिये यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि भारत अब “पुरानी, रक्षात्मक और झिझक वाली विदेश नीति” से बाहर निकल चुका है और एक नए, निर्णायक और निर्भीक वैश्विक खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है।
प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए भाषणों, शिखर सम्मेलनों की चमकदार तस्वीरों और “विश्वगुरु” जैसे शब्दों ने इस छवि को और मजबूत किया। लेकिन विदेश नीति का वास्तविक मूल्यांकन न तो भाषणों से होता है और न ही सोशल मीडिया ट्रेंड्स से।
विदेश नीति की असली परीक्षा तब होती है जब किसी देश को संकट, संघर्ष, युद्ध, तख्तापलट, अंतरराष्ट्रीय दबाव या रणनीतिक टकराव का सामना करना पड़ता है। दुर्भाग्य से, जब हाल के वर्षों की ऐसी घटनाओं को देखा जाता है, तो भारत की विदेश नीति आत्मविश्वास से अधिक असहजता, चुप्पी और प्रतिक्रियात्मक रवैये से ग्रस्त दिखाई देती है।
यह लेख इसी अंतर को उजागर करने का प्रयास है — प्रचार और यथार्थ के बीच बढ़ती खाई, आक्रामक दावों और कमजोर कूटनीतिक परिणामों के बीच का विरोधाभास।
विदेश नीति : शक्ति प्रदर्शन नहीं, दीर्घकालिक रणनीति
किसी भी देश की विदेश नीति का उद्देश्य केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं होता। उसका मूल उद्देश्य होता है —
- राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना
- पड़ोसियों के साथ स्थिर और संतुलित संबंध बनाए रखना
- वैश्विक मंचों पर अपने हितों की रक्षा करना
- संकट के समय अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना
- आर्थिक और रणनीतिक हितों का विस्तार करना
यदि कोई देश सैन्य कार्रवाई करता है लेकिन उसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकेला पड़ जाता है, तो यह उसकी विदेश नीति की विफलता मानी जाती है — चाहे घरेलू स्तर पर उसे कितना भी साहसिक बताया जाए।
ऑपरेशन सिंदूर : सैन्य कार्रवाई, कूटनीतिक असफलता
ऑपरेशन सिंदूर को देश के भीतर एक ऐतिहासिक और निर्णायक सैन्य कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसे राजनीतिक इच्छाशक्ति, बदले की नीति और “नई भारत नीति” का प्रमाण बताया गया।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया ने इस अभियान की सीमाएँ उजागर कर दीं।
इज़रायल को छोड़कर किसी भी प्रमुख वैश्विक शक्ति ने भारत का खुलकर समर्थन नहीं किया। न यूरोप, न अमेरिका, न रूस — सभी ने संतुलित या अस्पष्ट बयान दिए।
इसके विपरीत पाकिस्तान को —
- तुर्की से खुला समर्थन
- चीन से कूटनीतिक संरक्षण
- अमेरिका से सहानुभूति
- इस्लामिक देशों से नैतिक समर्थन
मिला।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी भारत का पक्ष अपेक्षाकृत कमजोर रहा। कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ने पाकिस्तान के पक्ष में प्रचारित किया पाकिस्तान के बातो को ही दोहराया , उसी के नरेटिव को प्रचारित किया
यहाँ तक की ऑपरेशन सिन्दूर के बाद अमेरिका के राष्ट्पति डोनाल्ड ट्रम्प , आसिम मुनीर के साथ बैठके किया उसे सराहा , एक ऐसे सैन्य अधिकारी जो खुद अमेरिका की धरती से परमाणु धमकी देता है और ट्रम्प न सिर्फ मुलाकात करता है बल्कि पार्टी भी देता है
ये भारत की विदेशनीति की असफलता से कम नहीं था
यह स्पष्ट करता है कि भारत सैन्य कार्रवाई के बाद वैश्विक नैरेटिव स्थापित करने में विफल रहा। आज युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, वे न्यूज़रूम, सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी लड़े जाते हैं।
पड़ोस पहले : लेकिन भारत का पड़ोस दूर होता गया
भारत स्वयं को एक उभरती क्षेत्रीय शक्ति मानता है। लेकिन किसी भी क्षेत्रीय शक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है उसका पड़ोस।
दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति आज पहले से कहीं अधिक कमजोर और अस्थिर दिखाई देती है।
नेपाल : मित्रता से अविश्वास तक
नेपाल कभी भारत का सबसे भरोसेमंद पड़ोसी और रणनीतिक साझेदार माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह संबंध गंभीर अविश्वास में बदल गया।
सीमा विवाद, नक्शे को लेकर तनाव, राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप और आर्थिक दबाव — इन सबने नेपाल में भारत-विरोधी भावना को गहरा किया।
चिंताजनक तथ्य यह है कि नेपाल के भारत-विरोधी रुख पर भारत की प्रतिक्रिया या तो बेहद धीमी रही या लगभग अनुपस्थित।
जहाँ पहले भारत नेपाल की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता था, आज वह केवल एक असहज दर्शक बनता जा रहा है।
श्रीलंका : चीन की बढ़त, भारत की चूक
श्रीलंका का आर्थिक और राजनीतिक संकट भारत के लिए एक बड़ा अवसर हो सकता था। लेकिन इस संकट के दौरान भारत निर्णायक नेतृत्व दिखाने में असफल रहा।
चीन ने न केवल आर्थिक सहायता दी बल्कि अपने दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को भी और मजबूत किया।
हंबनटोटा बंदरगाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है — जहाँ भारत की अनुपस्थिति और चीन की सक्रियता स्पष्ट दिखाई देती है।
बांग्लादेश : मित्र राष्ट्र से सुरक्षा चुनौती तक
बांग्लादेश को लंबे समय तक भारत की विदेश नीति की “सफलता की कहानी” बताया जाता रहा। लेकिन तख्तापलट और सत्ता परिवर्तन के बाद स्थिति तेजी से बदली। वहां की स्थिति को समझने में भारत बिलकुल नाकाम रहा ,विदेशी ताकतों ने वहां तख्तापलट करने में सफल रहा लेकिन भारत इस खतरों को समझ नहीं पाया या तो सबकुछ जानते हुए मूकदर्शक बना रहा , स्थिति ऐसी हो गई है की वहां के सरकार से लेकर जनता तक भारत को आँखे दिखा रहा है और भारत मूकदर्शक सुन रहा है
नई राजनीतिक धारा में भारत-विरोधी और पाकिस्तान समर्थक तत्वों की सक्रियता बढ़ी है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बांग्लादेश में पाकिस्तान की कूटनीतिक और खुफिया मौजूदगी बढ़ती जा रही है। यदि भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच कोई बड़ा संघर्ष होता है, तो बांग्लादेश भारत के लिए एक अतिरिक्त रणनीतिक मोर्चा बन सकता है।
बांग्लादेश में हिंदू : नैतिकता की परीक्षा
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमले केवल एक आंतरिक मामला नहीं हैं। यह भारत की विदेश नीति की नैतिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक परीक्षा है।
हत्या, बलात्कार, मंदिरों का विध्वंस, जबरन पलायन — ये घटनाएँ किसी एक इलाके तक सीमित नहीं हैं।
लेकिन भारत की प्रतिक्रिया —
- न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभावी दबाव
- न कूटनीतिक चेतावनी
- न मानवाधिकार संगठनों को सक्रिय करना
तक सीमित रही।
विडंबना यह है कि भारत के आंतरिक मामलों पर वही अंतरराष्ट्रीय समुदाय तुरंत प्रतिक्रिया देता है, लेकिन जब भारतीय मूल के लोगों या हिंदुओं की बात आती है, तो भारत की आवाज़ कमजोर पड़ जाती है।
ताजिकिस्तान, चाबहार और रणनीतिक संकुचन
ताजिकिस्तान में भारत का सैन्य एयरबेस मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक उपस्थिति का प्रतीक था। उसका चुपचाप छोड़ा जाना यह दर्शाता है कि भारत अब रणनीतिक दबावों का सामना करने में कमजोर हो गया है।
इसी तरह चाबहार पोर्ट, जिसे पाकिस्तान को बाइपास करने की कुंजी माना जाता था, वह भी अमेरिकी और अन्य दबावों के चलते संकट में है।
अरबों डॉलर खर्च करने के बावजूद इस परियोजना से पीछे हटना दीर्घकालिक रणनीतिक विफलता को दर्शाता है।
पाकिस्तान की कूटनीतिक वापसी
एक समय दावा किया गया था कि भारत पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर देगा। लेकिन वास्तविकता इसके उलट दिखाई देती है।
पाकिस्तान ने —
- तुर्की, चीन, ईरान से संबंध मजबूत किए
- इस्लामिक मंचों पर अपनी सक्रियता बढ़ाई
- अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अपनी छवि सुधारने की कोशिश की
जबकि भारत कई मंचों पर पाकिस्तान के साथ एक ही श्रेणी में रखा जाने लगा है — जो भारत की वैश्विक छवि के लिए घातक संकेत है।
रूस और अमेरिका : बदलती प्राथमिकताएँ
रूस, जिसे भारत का पारंपरिक मित्र माना जाता था, आज पाकिस्तान के साथ आपसी सहयोग बढ़ा रहा है।
अमेरिका के साथ संबंध भी एकतरफा उत्साह से आगे नहीं बढ़ पाए। डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं द्वारा सार्वजनिक अपमान के बावजूद भारत की प्रतिक्रिया बेहद सीमित रही। भारत को डोनाल्ड ट्रंप बार बार अपमानित कर रहा है लेकिन भारत इसमें भी मूकदर्शक सिर्फ सुन रहा जिससे भारत की छवि बहुत ज्यादा नुकसान पहुँच रहा है
कूटनीति में चुप्पी हमेशा रणनीति नहीं होती — कई बार वह कमजोरी का संकेत होती है।
आर्थिक असर और शेयर बाजार
विदेश नीति की कमजोरी का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
वैश्विक अनिश्चितता, अमेरिकी बयानबाज़ी और रणनीतिक अस्थिरता के चलते भारतीय शेयर बाजार बार-बार दबाव में आता रहा।
घरेलू राजनीति बनाम राष्ट्रीय हित
भारत सरकार पर यह आरोप लगातार गहराता जा रहा है कि विदेश नीति से अधिक प्राथमिकता घरेलू चुनावी राजनीति को दी जा रही है।
जब प्रधानमंत्री स्वयं स्थानीय निकाय चुनावों तक में उतरते हैं, तो यह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के असंतुलन को दर्शाता है।
निष्कर्ष : आत्मप्रचार नहीं, आत्ममंथन
भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।
या तो वह विदेश नीति को प्रचार, नारों और भाषणों तक सीमित रखे — या फिर ईमानदार आत्ममंथन कर वास्तविक, संतुलित और दूरदर्शी रणनीति अपनाए।
यदि ऐसा नहीं हुआ, तो “विश्वगुरु” का सपना केवल पोस्टरों तक सीमित रह जाएगा और भारत वैश्विक मंच पर धीरे-धीरे अकेला पड़ता जाएगा।


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