शुक्रवार, 18 मार्च 2022

किसी विद्युत हीटर के परिपथ में जुड़ा चालक तार क्यों उत्तप्त नहीं होता है जबकि उसका तापन अवयव उत्तप्त हो जाता है ?

  किसी विद्युत हीटर के परिपथ में जुड़ा चालक तार क्यों उत्तप्त  नहीं होता है   जबकि उसका तापन अवयव उत्तप्त  हो जाता है ? 


 किसी विद्युत हीटर के परिपथ में जुड़ा चालक तार  प्रायः तांबे का होता है जबकि विद्युत हीटर का तापन  अवयव  प्रायः नाइक्रोम का  बना होता है और नाइक्रोम की प्रतिरोधकता तांबे से बहुत अधिक होती हैं इसलिए तार उत्तप्त  नहीं होता है  जबकि तापन अवयव उत्तप्त   हो जाता है |

गुरुवार, 17 मार्च 2022

विद्युत तापन युक्तियों जैसे ब्रेड टोस्टरो तथा विद्युत इस्तरीयो के तापन अवयव शुद्ध धातु के न बनाकर किसी मिश्र धातु के क्यों बनाये जाते है ?

 विद्युत तापन युक्तियों जैसे ब्रेड टोस्टरो तथा विद्युत इस्तरीयो  के तापन अवयव शुद्ध धातु के न बनाकर किसी मिश्र धातु के क्यों बनाये जाते है ? 

      विद्युत तापन अवयव का मतलब होता है कि उससे ऊष्मा  अधिक मात्रा में निकले अर्थात इस अवयव से  ऊष्मा अधिक मात्रा में निकले जब इससे  ऊष्मा अधिक  मात्रा में निकलेगा तो निश्चित रूप से इस अवयव का गलनांक भी अधिक होनी चाहिए नहीं तो इसका गलनाक कम होने पर ये अवयव बहुत जल्द ही गल जायेगा | 

    इसलिए  विद्युत तापन युक्तियों  के तापन अवयव  शुद्ध धातु के ना बनाकर किसी मिश्र धातु जैसे नाइक्रोम के बनाए जाते हैं | क्योंकि इसका प्रतिरोधकता बहुत अधिक होती है | और इसका गलनांक अत्यधिक उच्च  होता है | 

मंगलवार, 15 मार्च 2022

ऐमीटर तथा वोल्टमीटर किसे कहा जाता है ? ऐमीटर तथा वोल्टमीटर में अंतर लिखे

     ऐमीटर तथा वोल्टमीटर  किसे कहा जाता है ? ऐमीटर तथा वोल्टमीटर में  अंतर लिखे   

                       ऐमीटर 

  वैसे यंत्र जिसके द्वारा किसी विद्युत परिपथ की धारा को मापा जाता है उसे ऐमीटर कहा जाता है | 

        ऐमीटर को किसी परिपथ में जुड़े उपकरणों के साथ इस  प्रकार जोड़ा जाता है कि  परिपथ की कुल धारा इस यंत्र से होकर प्रवाहित हो |

                  वोल्टमीटर

 वैसे यंत्र जिसके द्वारा किसी विद्युत परिपथ के किन्ही दो बिंदुओं के बीच विभवांतर को  मापा जाता है उसे  वोल्टमीटर कहा जाता है |

                 ऐमीटर तथा वोल्टमीटर में  अंतर लिखे   

         ऐमीटर और वोल्ट्मीटर में अंतर निम्नलिखित है -

 (1) वैसे यंत्र जिसके द्वारा किसी विद्युत परिपथ की धारा को मापा जाता है उसे ऐमीटर कहा जाता है | 

           जबकि वैसे यंत्र जिसके द्वारा किसी विद्युत परिपथ के किन्ही दो बिंदुओं के बीच विभवांतर को  मापा जाता है उसे  वोल्टमीटर कहा जाता है | 

(2)  एमीटर किसी विद्युत परिपथ में विद्युत धारा की प्रबलता को मापता है | 

           जबकि वोल्टमीटर  किसी विद्युत परिपथ में किन्ही दो बिंदुओं के बीच विभवांतर को मापता है | 

(3)   ऐमीटर का स्केल  एंपियर में अंकित रहता  है | 

         जबकि वोल्टमीटर का स्केल वोल्ट में अंकित रहता है | 

(4) ऐमीटर को किसी विद्युत परिपथ में श्रेणी क्रम में जोड़ा जाता है |

                जबकि वोल्टमीटर को किसी विद्युत परिपथ में समानांतर क्रम में जोड़ा जाता है |



शुक्रवार, 11 मार्च 2022

निम्न की परिभाषा लिखें विद्युत विभव विद्युत धारा विभवंतार प्रतिरोध इसके si मात्रक भी लिखे

  निम्न की परिभाषा लिखें विद्युत विभव , विद्युत धारा , विभवंतार , प्रतिरोध ,  विधुत धारा की प्रबलता ? इसके si  मात्रक भी लिखे  

                विधुत विभव 

  इकाई धन आवेश को अनंत से किसी बिंदु तक लाने में किए गए कार्य को उस बिंदु पर विद्युत विभव कहा जाता है इस का एस आई मात्रक वोल्ट होता है जिसे V से सूचित किया जाता है |

    1V  = 1J/C होता है 

                         विधुत धारा 

              किसी चालक पदार्थ में किसी भी दिशा में दो बिंदुओं के बीच आवेश के व्यवस्थित प्रवाह  होता है उस प्रवाह को विद्युत धारा कहा जाता है | 

 विद्युत धारा का मात्रक एंपियर होता है जिसे अंग्रेजी के बड़े अक्षर A से सूचित किया जाता है | 

   1A = 1C/1S  होता है | 

                            विभवांतर 

            दो बिंदुओं के बीच निम्न विभव से उच्च  विभव तक  इकाई धन आवेश को ले जाने में किया गया  कार्य को विभवांतर कहा जाता है |

                विभवांतर का भी एस आई  ( SI  ) मात्रक बोल्ट होता है जिसे अंग्रेजी के बड़े अक्षर V से सूचित किया जाता है  |

                           प्रतिरोध 

 किसी पदार्थ का वह गुण जो उससे होकर विद्युत धारा के प्रवाह का विरोध करता है | उस पदार्थ का विद्युत प्रतिरोध या केवल प्रतिरोध कहा जाता है |

              प्रतिरोध का एस आई  ( SI ) मात्रक ओम होता है | जिसे ग्रीक भाषा के बड़े अक्षर ओमेगा (     ) द्वारा सूचित किया जाता है |

   1 ओम = 1V/1A = V/A

                     विधुत धारा की प्रबलता 

 किसी चालक के किसी अनुप्रस्थ काट को पार करने वाले विद्युत धारा की प्रबलता उस अनुप्रस्थ काट  से होकर प्रति इकाई समय में प्रवाहित आवेश का परिमाण होता है | 


गुरुवार, 10 मार्च 2022

विद्युत परिपथ किसे कहते हैं ? विद्युत परिपथ में फ्यूज तार क्यों लगाए जाते हैं ?

  विद्युत परिपथ किसे कहते हैं ? विद्युत परिपथ में फ्यूज तार क्यों लगाए जाते हैं ?

                        विद्युत परिपथ 

 जिस पथ से होकर विद्युत धारा का प्रवाह होता है उसे विद्युत परिपथ कहा जाता है | 

 विद्युत धारा का प्रवाह तभी हो सकता है जब उसका पथ  पूरा हो  खुले विद्युत परिपथ में धारा का प्रवाह नहीं होता है | 

    विद्युत परिपथ में फ्यूज तार क्यों लगाए जाते हैं ? 

      विद्युत परिपथ में फ्यूज तार सुरक्षा की दृष्टि से लगाया जाता है |

 बिजली के ऊपर उपस्करों तथा  बिजली की धारा ले जाने के लिए जो परिपथ बनाया जाता है | उसमें फ्यूज तार लगा जाता है फ्यूज तार जस्ता या लेड और टीन  की मिश्र धातु का तार लगा होता है |  फ्यूज तार की प्रतिरोधकता अधिक और गलनांक कम होता है | जिसके कारण जब परिपथ में अचानक धारा की प्रबलता आवश्यकता से अधिक बढ़ जाती है | तब धारा से उत्पन्न अत्यधिक उस्मा फ्यूज के तार को पिघला देती हैं | क्योंकि फ्यूज के तार का गलनांक कम होता है | इसलिए यह  पिघल जाती है | और परिपथ टूट जाता है जिसके कारण उस परिपथ में धारा का प्रवाहित होना बंद हो जाता है | और उसमें लगे  सभी उपकरण  जैसे पंखे , बल्ब,  फ्रीज , टेलीविजन , ट्रांजिस्टर , मोटर आदी   जलने से बच जाते हैं |

              इस प्रकार विद्युत परिपथ में फ्यूज तार लगाकर सभी उपकरण को सुरक्षा दी जाती हैं | जिसके कारण सभी उपकरण सुरक्षित रहते हैं |

        इसीलिए विद्युत परिपथ में फ्यूज तार लगाई जाती है | ताकि विद्युत परिपथ में लगे सभी उपकरण  जलने से बचे रहे |

बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

जब लोहे की कील को कॉपर सल्फेट के विलयन में डुबोया जाता है तो विलयन का रंग क्यों बदल जाता है ?

 जब लोहे की कील को कॉपर सल्फेट के विलयन में डुबोया जाता है तो विलयन का रंग क्यों बदल जाता है  ?

    उत्तर 

      जब लोहे की कील को कॉपर सल्फेट के विलयन में डुबोया जाता है तो विलयन का रंग बदल जाता है क्योंकि लोहे के द्वारा कॉपर सल्फेट को विस्थापित कर देता है और इस विस्थापन अभिक्रिया के   कारण लौह सल्फेट का निर्माण होता है  | 

        इसलिए  जब लोहे की कील को कॉपर सल्फेट के विलयन में डुबोया जाता है तो विलयन का रंग  बदल जाता है |

     CuSO4 + Fe    ⟶   FeSO4 + Cu 

शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

रासायनिक समीकरण को संतुलित करना क्यों आवश्यक होता है

 रासायनिक समीकरण को संतुलित करना क्यों आवश्यक होता है ? 

  उत्तर 

        रासायनिक समीकरण को संतुलित करना  आवश्यक होता है क्योंकि रासायनिक समीकरण को संतुलित करने से समीकरण की वास्तविक जानकारी प्राप्त करते है | साथ ही साथ अभिकारकों एवं उत्पादों की वास्तविक संख्या की जानकारी भी प्राप्त कर सकते है | 

शनिवार, 15 जनवरी 2022

ऊष्माक्षेपी एवं ऊष्माशोषी अभिक्रिया का क्या अर्थ है ? उदहारण दीजिए

 ऊष्माक्षेपी एवं ऊष्माशोषी अभिक्रिया का क्या अर्थ है ? उदहारण दीजिए 


ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया -     वैसी अभिक्रिया जिसमे अभिक्रिया के दौरान  ऊर्जा मुक्त होती है उसे ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया कहा जाता है | 

   जैसे  

 CH4 + 2O2 ⟶  CO2 + 2H2O + ऊष्मा 

 ऊष्माशोषी अभिक्रिया  -  वैसी अभिक्रिया जिसमे अभिक्रिया के दौरान ऊष्मा अवशोषित होती है उसे ऊष्माशोषी अभिक्रिया कहा जाता है | 


  CaCO3 ---गर्म करने पर ----- ⟶ CaO + CO2 


प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं ?प्राकृतिक संसाधन के बारे में वर्णन करे

 

               प्राकृतिक संसाधन किसे  कहते हैं ? 

 किसी देश की अर्थव्यवस्था वहां पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करती है इसलिए उनकी स्थिति , उपलब्धता , विकास तथा  संरक्षण की जानकारी आवश्यक है

            कुछ प्राकृतिक संसाधन निम्नलिखित है

      भूमि संसाधन किसे कहते है इसके बारे में वर्णन करे 

 भूमि एक प्राकृतिक संसाधन है जिसका अनेक कार्यों के लिए उपयोग होता है पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इसका उचित उपयोग आवश्यक है देश का भू राजस्व विभाग भू उपयोग संबंधी अभिलेख रखता है भूख उपयोग संवर्गों का योग कुल  प्रतिवेदन क्षेत्र के बराबर होता है जो कि भौगोलिक क्षेत्र से भिन्न है भारत की प्रशासकीय इकाइयों के भौगोलिक क्षेत्र की सही जानकारी देने का दायित्व भारतीय सर्वेक्षण विभाग के पास है

 भू राजस्व तथा सर्वेक्षण विभाग दोनों में मूलभूत अंतर यह है कि भू राजस्व द्वारा प्रस्तुत क्षेत्रफल प्रतिवेदित  क्षेत्र पर आधारित है जो  की कम या अधिक हो सकता है  जबकि कुल भौगोलिक क्षेत्र भारतीय सर्वेक्षण विभाग के सर्वेक्षण पर आधारित है और यह स्थाई होता है

                      भू  उपयोग वर्गीकरण

 भारत के 328.726 मिलियन  हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से केवल 305.51 मिलियन  हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र  के बारे में ही भूमि उपयोग आंकड़े प्राप्त है भारत का वर्तमान भूमि उपयोग प्रतिरूप स्थलाकृति , जलवायु , मिट्टी , मानव क्रियाओं , और प्रौद्योगिकी आदानों   ऐसे अनेक कारको का प्रतिफल है 

                    वनों के अधीन क्षेत्र

 वर्गीकृत वन क्षेत्र तथा वनों के अंतर्गत वास्तविक क्षेत्र दोनों पृथक है सरकार द्वारा वर्गीकृत वन क्षेत्र का सीमांकन इस प्रकार किया जाता है जहां वन  विकसित हो सकते हैं भू राजस्व अभिलेखों में इसी परिभाषा को सतत अपनाया गया है इस प्रकार इस संवर्ग के क्षेत्रफल में वृद्धि दर्ज हो सकती है किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि यहां वास्तविक रूप से वन पाए जाएंगे 

 वनों के वर्गीकरण तथा वृक्षारोपण कार्यक्रम के फलस्वरूप हमारे देश में वन क्षेत्र में कुछ  वृद्धि हुई है

 वर्ष 1950 से 1951 में वन प्रदेश केवल 4.0  करोड़ हेक्टेयर था वही वन रिपोर्ट वर्ष 2017 के अनुसार देश में वनों के अधीन 802088 वर्ग किलोमीटर है  जो देश की कुल भूमि का 24.39% है

                      अन्य कृषि रहित भूमि

 वैसे भूमि जिस पर कृषि नहीं की जाती है कृषि रहित भूमि कहा जाता है परंतु इसमें परती भूमि को सम्मिलित नहीं किया जाता है इस भूमि में निरंतर कमी आ रही है इस प्रकार की भूमि के अग्रलिखित उपवर्ग हो सकते हैं

 स्थाई चरागाह तथा अन्य चराई  भूमि देश के कई भागों में इस प्रकार की भूमि को साफ करके कृषि योग्य  बनाया जा सकता है

         वृक्षों , फसलों तथा उपवनों के अधीन भूमि - 

 इस वर्ग में ऐसी भूमि सम्मिलित की गई है जिस पर बाग वा अनेक प्रकार के पेड़ पाए जाते हैं जिसमें फल आदि प्राप्त होते हैं  वर्तमान समय में देश की बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्यान पूर्ति के लिए भूमि के बहुत से भाग पर कृषि  होने लगी है

                  कृषि योग्य परंतु बंजर भूमि

 यह  वह  भूमि है जो किसी भी काम के लिए प्रयोग नहीं की जाती है आधुनिक तकनीकी सहायता से उत्तम बीज , खाद  तथा सिंचाई की व्यवस्था करके कृषि के लिए इसका प्रयोग किया जा सकता है  बढ़ती हुई जनसंख्या के संदर्भ में भारत के लिए इस भूमि का बड़ा महत्व है पंजाब , हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में इस भूमि  का काफी विस्तार मिलता है  पिछले कुछ वर्षों में इस भूमि में सुधार करने के प्रयास किए गए हैं

                              परती भूमि

 यह वह  भूमि है जिस पर पहले कृषि  की जाती थी परंतु अब इस भूमि पर कृषि नहीं की जाती है ऐसे भूमि पर निरंतर कृषि  करने से भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती और  ऐसी भूमि पर कृषि करना आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं रहता है अतः इसे कुछ समय के लिए खाली छोड़ दी जाता है  इसे फिर से उर्वरा शक्ति का विकास होता है और वह कृषि  के लिए उपयुक्त हो जाती है 

                                कृषित भूमि

 यह वह भूमि है जिस पर वास्तविक रूप से कृषि की जाती है इसे कुल या  सकल बोया गया क्षेत्र भी कहा जाता है  भारत में लगभग आधी भूमि पर कृषि की जाती है जो विश्व में सर्वाधिक भाग है भारत की कुल भूमि का 43.41% भाग कृषित है 

                   निवल  बोया गया क्षेत्र

 यह वह  भूमि है जिस पर फसलें उगाई व काटी जाती है यह निवल बोया गया क्षेत्र कहलाता है स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसमें पर्याप्त वृद्धि हुई है  इस वृद्धि के मुख्य कारण निम्नलिखित है

   रेह तथा उसर भूमि को उपजाऊ बनाना

 बेकार खाली पड़ी भूमि को कृषि योग बनाना

 कृषि भूमि को पड़ती भूमि के रूप में ना छोड़ना

 चारागाह तथा बागों के लिए उपयोग की गई भूमि को कृषि के लिए प्रयोग करना

 सबसे अधिक कृषित भूमि पंजाब तथा हरियाणा में पाई जाती है जहां 80% भूमि पर कृषि की जाती है

                  एक से अधिक बार बोया गया क्षेत्र 

 भारत में कुल कृषित क्षेत्र का लगभग 25% भाग ऐसा है जिस पर वर्ष  में एक से अधिक बार फसल प्राप्त की जाती है इससे यह स्पष्ट होता है कि हम अपनी भूमि  का उचित प्रयोग  नहीं कर रहे हैं  क्योंकि 75% भूमि पर वर्ष में केवल एक ही फसल उगाई जाती है

        जल संसाधन के बारे में बताएं

 जल बहुमुल्य प्राकृतिक संसाधन है और देश के सामाजिक और आर्थिक विकास का मूल आधार है  भारत में ताजे जल का मुख्य स्रोत वर्षन है वर्षन से भारत में 4000 घन किमी  जल प्राप्त होती है 

 अकेले मानसूनी वर्षा  द्वारा 3000 घन किमी जल प्राप्त होता है इसका बहुत सा भाग या तो  वाष्पीकरण  तथा वाष्पोत्सर्जन द्वारा वायुमंडल में चला जाता है या फिर भूमी मे रिसकर  भूमिगत जल का भाग बन जाता है  जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार हमारे देश में कुल 1869 घन किमी  जल उपलब्ध है  परंतु भू आकृतिक परिस्थितियों तथा जल संसाधनों के असमान वितरण के कारण उपयोग के योग कुल 1122 अरब घन मीटर जल ही उपलब्ध है 

 भारत में उपलब्ध कुल जल को दो विभिन्न वर्गों में बांटा जा सकता है धरातलीय जल तथा भूगर्भिक जल

                      धरातलीय जल

 सतही जल हमें नदियों , झीलों , तालाबों तथा अन्य जलाशयों के रूप में मिलता है नदियों में जल वर्षा होने अथवा बर्फ के पिघलने से प्राप्त होता है सबसे अधिक सतही जल नदियों में पाया जाता है  भारत की नदियों का अनुमानित औसत वार्षिक प्रवाह 8869 अरब धन मीटर है परंतु स्थालाकृति , जल विज्ञान संबंधी  तथा अन्य बाधाओं के कारण केवल 690 अरब घन मी  धरातलीय जल ही उपयोग के लिए उपलब्ध है  कुल धरातलीय  जल का लगभग 60% भाग भारत के तीन प्रमुख नदियों सिंधु , गंगा और ब्रह्मपुत्र में से होकर बहता है  भारत में निर्मित तथा निर्माणाधीन जल भंडार की क्षमता स्वतंत्रता के समय केवल 18 अरब घन मी थी  जो अब बढ़कर 147 अरब घन मीटर हो गई है यह भारतीय नदी द्रोणीओं में प्रवाहित होने वाली कुल जल राशि का 8.47% है 

                 भौम जल या भूगर्भिक जल

 वर्षा से प्राप्त हुए जल की कुल मात्रा का कुछ भाग भूमि द्वारा सोख लिया जाता है इसका 60% भाग मिट्टी की ऊपरी सतह तक ही पहुंचता है  यही जल कृषि उत्पादन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है शेष जल धरातल के भीतर  प्रवेश  स्तर तक  पहुंचता है   इस जल को कुआं खोदकर प्राप्त किया जाता है अनुमान है कि भारत में कुल  अपूरणीय भौम जल क्षमता लगभग 432 अरब घन मीटर है

 देश में भूगर्भिक जल का वितरण बहुत  आसामान है इस पर चट्टान की संरचना धरातलीय दशा जलापूर्ति की दशा आदि कारणों का प्रभाव पड़ता है भारत के समतल मैदानी भागों में स्थित जल  चट्टानों वाले अधिकांश भागों में भूगर्भीय जल की अपार राशि  विद्यमान है यहां पर प्रवेश्य  चट्टाने पाई जाती है  जिसमें से जल आसानी से रिसकर  भूगर्भिक जल का रूप धारण कर लेता है  लगभग 42% से अधिक भौम जल भारत के  विशाल  मैदानो के  राज्यो में पाया जाता है 

 इसके विपरीत  प्रायद्वीपीय पठारी भाग कठोर तथा अप्रवेश्य  चट्टानों का बना हुआ है  जिसमें से जल रिसकर  नीचे नहीं जा सकता इसलिए इस क्षेत्र में भूगर्भिक जल का अभाव है

                   भौम जल का उपयोग

 भौम जल का लगभग 92% भाग कृषि में प्रयोग किया जाता है तथा शेष 8% भाग घरेलू  औद्योगिक तथा अन्य संबंधित उद्देश्यों की पूर्ति करता है भारत में भूमिगत जल के विकास की बड़ी संभावनाएं हैं क्योंकि अभी तक कुल उपलब्ध संसाधनों का केवल 37.23% भाग ही विकसित किया गया है 

 राज्य स्तर पर भौम जल संसाधनों की कुल संभावित क्षमता की दृष्टि से बहुत विषमता में पाई जाती है राज्यों में भौम जल के विकास में अंतर जलवायु के कारण पाया जाता है

           जल संसाधनों का प्रबंधन एवं संरक्षण…

 जल के प्रबंधन एवं संरक्षण का उद्देश्य जल की बढ़ती हुई मांग को पूरा करना तथा  जल के स्रोतों को  ह्रास से बचाना है जल संसाधनों के संरक्षण के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं

  धरातलीय जल का संरक्षण करने के लिए नदियों पर बांध बनाकर वर्षा ऋतु के अतिरिक्त जल का संरक्षण किया जा सकता है अन्यथा वह जल भरकर समुद्र में चला जाता है

 हमें भूजल पुनर्भरण की संस्कृति विकसित करनी होगी ताकि तेजी से समाप्त हो रहे हो भू जल का संरक्षण किया जा सके इसके लिए वर्षा जल संग्रहण सबसे अच्छी तकनीकी है

 वनीकरण द्वारा वर्षा जल के भूमि रिसने की दर को बढ़ाया जा सकता है

 जल के पुनर्चक्रण तथा पुनः प्रयोग द्वारा हम जल की कमी को पूरा कर सकते हैं

 उपयुक्त तकनीक का विकास कर समुद्री जल का खराबपन दूर कर उसका उपयोग करना

 जल सम्भर प्रबंधन कार्यक्रम द्वारा जल के स्रोतों का संरक्षण करना

 रेन वाटर हार्वेस्टिंग की तकनीक को लोकप्रिय बनाना

                       राष्ट्रीय  जल नीति

 जल की आपूर्ति , मांग तथा उसके तर्कसंगत उपयोग व प्रबंधन को ध्यान में रखकर केंद्रीय सरकार ने तीन राष्ट्रीय जल नीतियाँ अपनाई है

                       राष्ट्रीय जल नीति 1987

 यह राष्ट्रीय स्तर पर जल संसाधन संबंधित प्रथम नीति है इस नीति का मुख्य उद्देश्य जल का राष्ट्रीय हित में प्रबंधन करना तथा योजना तैयार करना था  इस नीति में जल के विकास संबंधी योजना बनाने का अधिकार राज्य सरकारों को दिया गया

                   राष्ट्रीय जल नीति 2002

 वर्ष 2002 में वर्ष 1987 की नीति के स्थान पर एक नई नीति अपनाई गई इस नीति में उपयुक्त रूप से विकसित सूचना व्यवस्था , जल संरक्षण के परंपरागत तरीकों , जल प्रयोग , गैर परंपरागत तरीकों और मांग के प्रबंधन को  महत्वपूर्ण तत्व के रूप में स्वीकार किया गया है इसमें सबके लिए पेयजल की व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है

                  राष्ट्रीय जल नीति 2012

 राष्ट्रीय जल बोर्ड ने जून 2012 को हुई अपनी  14वीं  बैठक में संस्तुत प्रारूप राष्ट्रीय जल नीति को  प्रस्तुत किया |  इस नीति में भू जल के उपयोग पर प्रयोक्ता  शुल्क लगाने के लिए तर्कसंगत प्रणाली विकसित करने की भी बात कही गई है प्रत्येक राज्य में जल विनियामक प्राधिकरण की स्थापना और पड़ोसी देशों के साथ द्विपक्षीय सहयोग पर करार किया गया है

           महासागरीय संसाधन के बारे में लिखें …

 अन्य प्राकृतिक संसाधन की तरह महासागरीय संसाधन भी  महत्वपूर्ण संसाधन है  इसे दो वर्गों में बांटा जा सकता है

                         खनिज संसाधन 

 खनिज संसाधन अनेक महत्वपूर्ण समुद्री बेसिन में पाए जाते हैं नीचे पाए जाने वाले समुद्री खनिजों में नॉड्यूल्स तथा मैग्नीज  ऑक्साइडो  तथा कोबाल्ट, निकेल , तांबे तथा लोहे के सल्फाइडों के टुकड़े पाए जाते हैं  आज विश्व के कुल तेल एवं प्राकृतिक गैस उत्पादन का पाँचवें भाग से अधिक भाग का उत्पादन अपतट कओं से आता है 

 भारत का पश्चिमी तट पूर्वी तट की तुलना में अधिक संसाधनों से युक्त है उदाहरण स्वरूप  बॉम्बे हाई मे  लगभग 750 करोड टन का पेट्रोलियम भंडार है  पूर्वी तट कावेरी , गोदावरी तथा महानदी के डेल्टा में भी प्राकृतिक  गैस और तेल के विशाल भंडार पाए जाते हैं इसके अतिरिक्त समुद्री मछलियां , मोती , शैवाल तथा प्रवाल भित्तियाँ भी समुद्री संसाधनों के  अंतर्गत आता है 

                  बहु  धात्विक नॉड्युल्स

  1970 के दशक के आरंभ में गहरे समुद्र में बहु  धात्विक नॉड्यूल्स के व्यापक स्रोत का पता चला है इसमें प्रमुख हैं  मैंगनीज , पिण्ड ,  जिसमें मुख्यत:  कोबाल्ट , तांबा , निकेल  एवं मैंगनीज धातु पाई जाती है  इन पिण्डो मे   अनेक भौतिक तथा रासायनिक पदार्थ पाए जाते हैं जो विभिन्न आकारों में पाए जाते हैं 

Note  गहरे समुद्र खनन में भारत के प्रयास से

[  हिंद महासागर में बहु धात्विक पिण्डो की खोज सर्वप्रथम वर्ष 1977 में गोवा स्थित राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान द्वारा की गई इस कार्य के लिए गार्डन रीच  वर्कशॉप कोलकाता द्वारा निर्मित प्रथम महासागरीय अनुसंधान  पोत गवेषणी  का प्रयोग किया गया जिसमें 28 जनवरी 1981 को पहली बार  हिंद महासागर की गहराइयों से बहु धात्विक खनिज पिण्डोंफ  को निकालने में सफलता प्राप्त की

 गणेषणी  के बाद आर पार एक भुवनेश्वर नामक जलयान का निर्माण भी सागर तल से  बहु धात्विक पिण्डो को  निकालने के उद्देश्य से किया गया  इस प्रकार भारत वर्ष 1987 में विश्व का पहला देश बना जिससे खनन क्षेत्र में पंजीकृत बहु धात्विक संसाधनों की पहचान एवं आकलन का कार्य किया इन संसाधनों के उत्खनन के लिए प्रौद्योगिकी तथा कार्मिकों के विकास के क्षेत्र में भारत में काफी प्रगति की है ]

                        जैविक संसाधन…

 समुद्र हमारी पृथ्वी के जीवीए पर्यावरण का सबसे बड़ा घटक है समुद्री जल में अनेक प्रकार के पौधे एवं जीव पनपते हैं समुद्री जैविक संसाधन के अंतर्गत पादप प्लवक , प्राणी प्लवक , नितलस्थ   प्राणी जल कृषि तथा मत्स्य शामिल ह

 भारतीय प्रयोग के लिए निर्धारित विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में 70 मीटर से अधिक गहराई में समुद्री जीव संसाधनों का आकलन करने तथा महासागर जीव विज्ञान कारको में  मत्स्य उपलब्धता का  संबंध जोड़ने के उद्देश्य से वर्ष 1997 -1998 में बहु विषयों तथा बहू संस्थानों वाला कार्यक्रम आरंभ किया गया 

 इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य है सतत विकास तथा प्रबंधन के लिए भारत के ईईजेड  मैं उपलब्ध समुद्री जीव संसाधनों की उपलब्धता की वास्तविक एवं विश्वसनीय जानकारी प्राप्त करना  तथा भारतीय समुद्रों में समुद्री जीव संसाधनों की उपलब्धता को बढ़ाना 

              समुद्री जल से शुद्ध जल की प्राप्ति …

 प्राकृतिक रूप से समुद्र तटीय  क्षेत्र के समुद्र जल में विभिन्न प्रकार के लवण जैसे सोडियम क्लोराइड मैग्निशियम क्लोराइड  इत्यादि पाए जाते हैं  जो उसे खारा बनाता है समुद्री जल में फ्लोरीन होने के कारण फ्लोरोसिस नामक बीमारी हो  जाती है जिससे हड्डियों में दर्द होता रहता है

 समुद्री जल के खारेपन को दूर करने के लिए बहुत से उपाय किए गए हैं जो निम्नलिखित हैं

                    सौर ऊर्जा तकनीक

 सौर ऊर्जा तकनीक के अंतर्गत सूर्यताप को केंद्रित करके समुद्री जल को उबाला जाता है और इससे उत्पन्न वाष्प से   शुद्ध जल को प्राप्त किया जाता है  भारत में गुजरात के अविनया गांव में इस तकनीक से पर्याप्त जल उपलब्ध कराया जाता है

                   लैश  डिस्टीलेशन तकनिक 

 इस तकनीक के अंतर्गत गर्म किए गए समुद्री खारे जल को अनेकों ऐसे कक्ष  से गुजारा जाता है  जिसके अंदर दाब वायुमंडलीय दाब से कम हो जाता है इससे इसकी कक्ष  के प्रत्येक भाग में वाष्पीकरण होता है तथा इस वाष्प को ट्यूबों  के बंडल में संघनित  कर लिया जाता है  इस प्रकार प्रत्येक चरण में आसवित  जल को एकत्र करके शुद्ध जल के रूप में प्रयोग किया जाता है

             इलेक्ट्रोडायलिसिस तकनिक 

 इस तकनीक के अंतर्गत समुद्री जल का खरापन दूर करने के लिए लोहे की चुनी हुई झीलियो  का प्रयोग किया जाता है  यह तकनीक 5000 पीपीएम से  कम मात्रा में खरापन दूर करने की सबसे कम खर्चीली  तकनीक है भारत में इस पद्धति का सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा रहा है

                    विपरीत परासरण तकनीक

 यह तकनीक सर्वाधिक प्रचलित है इस तकनीक में अनुकूल परासरण झिल्लियों  का प्रयोग किया जाता है जो उच्च दबाव के अंतर्गत  समुद्री जल से  खरापन को दूर करती हैं  भारत के समुद्री तट के क्षेत्रों में 50000 से 100000 लीटर की  क्षमता वाले संस्थान लगाए गए भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड द्वारा विपरीत परासरण तकनीक पर आधारित देश के सबसे बड़े डिसैलिनेशन प्लांट का डिजाइन तैयार किया गया है  इसे तमिलनाडु में स्थापित किया गया है जहां से जलाभाव वाले रामनाथपुरम जिले के 226 गांव में से 26 लाख से अधिक व्यक्तियों को  पीने का पानी उपलब्ध कराया जाएगा इस प्लांट की क्षमता 38 लाख लीटर समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने की है  

                समेकित तटीय व समुद्री क्षेत्र प्रबंधन …

 तटीय इलाकों की समस्याओं जैसे मिट्टी का अपरदन , प्रदूषण और अधिवास का नष्ट होना आदि से निपटने के लिए  वैज्ञानिक उपाय और तकनीकों का उपयोग करने के उद्देश्य से समेकित तटीय व समुद्री क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम वर्ष 1998 में शुरू किया गया  इसमें मैंग्रोव , पर्वतों तथा अन्य जीव विज्ञान के महत्वपूर्ण क्षेत्रों की स्थिति का आकलन दूरसंवेदी यंत्रों से किया जा सकता है

         तटीय समुद्र निगरानी एवं अनुमान प्रणाली

 समुद्री पर्यावरण की स्थिति का लंबे समय के लिए अनुमान लगाने के लिए तटीय समुद्र निगरानी एवं अनुमान प्रणाली को वर्ष 1990 में लागू किया गया | इसमे समुद्र से मिलने वाले औद्योगिक व घरेलू अस्वच्छ अपशिष्ट जल में रसायनों की मात्रा का आकलन किया जाता है  वर्तमान समय में यह भारत के 76 तटीय इलाकों में कार्यरत है

                 एकॉस्टिक टाइड गेज

 यह एक प्रकार की समर्पित संकेत प्रसंस्करण प्रणाली है  जिसके एनालॉग इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर के सभी हिस्से महासागर विकास विभाग के विभिन्न केंद्रों में विकसित किए गए हैं एटीजी प्रणाली का डिजाइन एवं विकास इस प्रकार किया गया है कि बिना किसी सहयोग के यह अकेले एक  महीने तक ज्वार भाटे में काम कर सकते हैं

                        मत्स्यन

 हमारे देश में मत्स्यन के लिए एक प्रमुख व्यवसाय है यह  व्यवसाय निर्यात द्वारा विदेशी मुद्रा अर्जित करने में सहायक है भारत में लगभग 18000 प्रकार की मछलियां पकड़ जाती है इसमें से कुछ हीं जाति की मछलियां पर्याप्त मात्रा में पकड़ी जाती है मत्स्यन उत्पादन के क्षेत्रों को दो भागों में बांटा जा सकता है  समुद्री मत्स्य क्षेत्र और ताजे  जल के मत्स्य क्षेत्र

                        समुद्री  मत्स्य  क्षेत्र

 समुद्र में लगभग 200 मीटर की गहराई तक महाद्वीपीय मग्नतट पर मछलियों के विकास तथा  प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां होती है  और वहां से बहुत बड़ी मात्रा में मछली पकड़ी जाती है

                    ताजे जल के मत्स्य क्षेत्र

 ताजे जल के मत्स्य क्षेत्र जैसे नदियों , नहरों , तालाबों , नालो पोखरो  आदि में ताजा जल होता है और इसमें से  पकड़ी जाने वाली मछली को ताजे जल की मछली कहा जाता है यह देश के आंतरिक भागों में पाई जाती है इसलिए इसे अंतर्देशीय मछली भी कहा जाता है

           भारत में मत्स्य उत्पादन 

 भारत का विश्व के मछली उत्पादन में दूसरा स्थान है  विश्व के कुल उत्पादन में भारत का योगदान लगभग 5.4% है  प्रारंभ में समुद्री मछली का उत्पादन अधिक होता था परंतु बाद में अंतर्देशीय मछली के उत्पादन में बड़ी  तीव्रता से वृद्धि हुई है  समुद्री मछली के संदर्भ में भारत का अधिकांश मछली उत्पादन  पश्चिमी तट पर होता है जहां 75% समुद्री मछलियां पकड़ी जाती है बाकी की 25% मछलियां पूर्वी तट से पकड़ी जाती है

 भारत में ताजे जल की मछलियां गंगा , ब्रह्मपुत्र  व सिंधु तथा इसकी सहायक नदियों में बड़ी मात्रा में पकड़ी जाती है  दक्षिण भारत की नदियों में भी मछलियां पकड़ी जाती है यद्यपि देश के सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में कुछ न कुछ मछली का उत्पादन होता है परंतु लगभग 70% उपज में केवल छ: राज्यों पश्चिम बंगाल , आंध्र प्रदेश , गुजरात , केरल , तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र का योगदान है  कुल मछली उत्पादन में आंध्र प्रदेश प्रथम स्थान पर है जबकि सागरीय मछली उत्पादन में गुजरात प्रथम स्थान पर है और अन्त: स्थलीय  मछली के उत्पादन में आंध्र प्रदेश प्रथम स्थान पर है

        महासागरीय  विकास कार्यक्रम 

 भारत में महासागरीय अनुसंधान की योजना बनाने तथा उनके समन्वय एवं स्वदेशी  क्षमताओं  के विकास हेतु वर्ष 1976 में विज्ञान और  प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत महासागर विज्ञान और प्रौद्योगिकी एजेंसी की स्थापना की गई महासागर विकास की गतिविधियों को आयोजित समन्वित  और प्रोत्साहित  करने के लिए एक नोडल संस्था के रूप में जुलाई  1981 में कैबिनेट सचिवालय के अधीन महासागर विकास विभाग की स्थापना की गई मार्च 1982 से महासागर विकास विभाग को पृथक रूप से एक केंद्रीय राज्य मंत्री के अधीन कर दिया गया वर्ष 1982 में समुद्री कानून के संबंध में हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में समझौते के अनुमोदन के लिए  एक अंतरराष्ट्रीय कानून स्थापित किया गया वर्ष 1982 में यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द  लॉ द सी द्वारा निर्मित इस नए समुद्री क्षेत्र के प्रभाव पर भी  भारत द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे

          संबंधित प्रमुख संस्थान

                        पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय

 महासागर  विकास मंत्रालय का नाम बदलकर उसे पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय कर दिया गया तथा इसकी अधिसूचना 12 जुलाई 2006 को जारी की गई यह मंत्रालय महासागर  संसाधन , महासागरों की स्थिति मानसून , तूफान , भूकंप आदि विषयों से संबंधित अध्ययन हेतु सर्वोत्तम सेवाएं उपलब्ध  कराता है

                राष्ट्रीय सागर विज्ञान संस्थान 

 नई दिल्ली स्थित वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अंतर्गत वर्ष 1966 में गोवा में एक राष्ट्रीय समुद्री विज्ञान संस्थान की स्थापना की गई इस संस्थान की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत के समीपवर्ती सागरों के भौतिक , रासायनिक , जीवविज्ञान विज्ञान ,  भूगर्भ विज्ञान और इंजीनियरिंग पक्षों  के संबंध में पर्याप्त ज्ञान विकसित करना है 

 इस संस्थान के पास स्वयं अपना महासागरीय अनुसंधान पोत गवेषणी है  जिसके कारण भारत सागर क्लब में स्थान पा सका था  इसके अतिरिक्त संस्थान द्वारा सागर विकास की  बहुउद्देशीय सागर जलयान सागर कन्या और समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान जलयान सागर सम्पदा का प्रबंधन कार्य भी सौंपा गया है संस्थान का आंकड़ा केंद्र सागर संबंधी आंकड़ों का भंडारण और प्रबंध भी करता है तथा समुद्री क्षेत्र के उपभोक्ता समुदाय को इस आंकड़ों के संबंध में जानकारी उपलब्ध कराता है

            राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान

 महासागर विकास के अंतर्गत समुद्री क्षेत्र से संबंधित प्रौद्योगिकी विकास करने के उद्देश्य से चेन्नई में राष्ट्रीय महासागर प्रोद्योगिकी संस्थान की स्थापना नवंबर 1993 में एक पंजीकृत संस्था के तौर पर की गई |

 


 

बुधवार, 12 जनवरी 2022

पीतल एवं ताँबे के बर्तनों में दही एवं खट्टे पदार्थ क्यों नहीं रखना चाहिए |

 पीतल एवं ताँबे के बर्तनों में दही एवं खट्टे पदार्थ क्यों नहीं रखना चाहिए  | 


  दही एवं खट्टे पदार्थो  में अम्ल की मात्रा होती है और अम्ल धातुओं के साथ अभिक्रिया करके लवण एवं हाइड्रोजन गैस बनाती है अतः यदि दही एवं खट्टे पदार्थ को पीतल एवं ताँबे के बर्तनो में रखा जाता है तो अम्ल के साथ अभिक्रिया करके बर्तन को संक्षारित करती है | 

    इसलिए  पीतल एवं ताँबे के बर्तन में दही एवं खट्टे पदार्थ नहीं रखा जाता है |

रविवार, 9 जनवरी 2022

लोहे की वस्तुओ को हम पेंट क्यों करते है ?

 लोहे  की  वस्तुओ को हम पेंट क्यों करते है ?

   जब  लोहे की वस्तु को  खुले वातावरण में   छोड़ दिया जाता है तो लोहे की वस्तु हवा या  नमी युक्त  वातावरण के संपर्क आ जाता है |  जब नमी युक्त वातावरण  के संपर्क  में लोहा आ जाता  है तो लोहे में  जंग लगना  प्रारंभ हो जाता है | जिससे लोहे की वस्तुओ को नष्ट होने का खतरा रहता है  | अर्थात लोहे की वस्तु ख़राब हो सकती  है | इसलिए लोहे की वस्तुओ को संक्षारण या जंग या नष्ट होने से बचाने के लिए हम लोहे की वस्तुओ  पेंट को करते है |  






शनिवार, 8 जनवरी 2022

सिल्वर के शोधन में सिल्वर नाइट्रेट के विलयन से सिल्वर प्राप्त करने के लिए कॉपर धातु द्वारा विस्थापन किया जाता है | इस प्रक्रिया के लिए अभिक्रिया लिखिए |

 सिल्वर के शोधन में सिल्वर नाइट्रेट के विलयन से सिल्वर प्राप्त करने के लिए कॉपर धातु द्वारा विस्थापन किया जाता है | इस प्रक्रिया के लिए अभिक्रिया लिखिए |

 उत्तर 

      जब सिल्वर नाइट्रेट के विलयन में कॉपर को डाला जाता है तो चुकी कॉपर सिल्वर से अधिक अभिक्रियाशील होती है | इसलिए यह सिल्वर को विस्थापित कर देता है | 

   2AgNO3 + Cu  ⟶   Cu(NO3)2 + Ag 


विस्थापन अभिक्रिया और द्विविस्थापन अभिक्रियाओं में क्या अंतर है ? इन अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखें


वियोजन अभिक्रिया को संयोजन अभिक्रिया के विपरीत क्यों कहा जाता है ? इन अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखें 


श्वशन को ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया कहा जाता है क्यों ?


Class Xth science निम्नलिखित रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए संतुलित समीकरण लिखिए (i) हाइड्रोजन + क्लोरीन ⟶ हाइड्रोजन क्लोराइड (ii) बेरियम क्लोराइड + एलुमिनियम सल्फेट ⟶ बेरियम सल्फेट एलुमिनियम क्लोराइड (iii) सोडियम + जल ⟶ सोडियम हाइड्रोक्साइड + हाइड्रोजन


आपको तीन परखनलियाँ दी गई है | इनमे से एक में आसवित जल शेष दो में से एक में अम्लीय विलयन तथा दसरे में क्षारीय विलयन है | यदि आपको केवल लाल लिटमस पत्र दिया जाता है | तो आप प्रत्येक परखनली में रखे गए पदार्थो की पहचान कैसे करेंगे ? 


RRB GROUP D /NTPC EXAM 2022 : विगत वर्षो में पूछे गए कुछ महत्वपूर्ण सामान्य विज्ञानं के प्रश्न जो RRB GROUP D /NTPC के लिए उपयोगी है ?  


शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

संक्षारण किसे कहते है तथा विकृत गंधिता क्या है ?

  निम्न पदों का  वर्णन करें तथा प्रत्येक  का एक एक उदाहरण दीजिए  

  (i) संक्षारण  (ii) विकृत गंधिता  

उत्तर 

   (i)  संक्षारण  - जब कोई  धातु  अपने आसपास नमी या नमीयुक्त वायु के संपर्क में आती है तब यह धातु संक्षारित होने लगती है इस प्रक्रिया को संक्षारण कहा जाता है | 

         संक्षारण के लिए कुछ परिस्थियाँ होना अनिवार्य है 

     (a)  नमी की उपस्थिति    (b)    वायु की उपस्थिति 

  लोहे में जंग लगना संक्षारण का एक सामान्य उदहारण है  | 

   ( ii) विकृत गंधित  -  जब तेल या वसायुक्त खाद्य पदार्थ हवा या वायु के संपर्क में आता है | तो उपचयित होकर तेल या वसायुक्त खाद्य पदार्थ विकृतगंधी हो जता है | अर्थात इसमें में एक अजीब सी गंध या ख़राब गंध आने लगती है | तथा तेल या वसायुक्त खाद्य पदार्थ का स्वाद तथा गंध भी बदल जाता है | इस प्रक्रिया को विकृत गंधिता कहा जाता है |

उदारहरण   तेलयुक्त या वसायुक्त खाद्य पदार्थ को ज्यादा दिनों तक रखने पर वह ख़राब हो जाता है तथा इसका स्वाद और गंध भी बदल जाता है |


 विस्थापन तथा द्विविस्थापन अभिक्रिया में क्या अंतर है ? इन अभिक्रियाओं के समीकरण लिखें 


वियोजन अभिक्रिया को संयोजन अभिक्रिया के विपरीत क्यों कहा जाता है ? इन अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखें 


श्वशन को ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया क्यों कहा जाता है ? 


आपको तीन परखनलियाँ दी गई है | इनमे से एक में आसवित जल शेष दो में से एक में अम्लीय विलयन तथा दसरे में क्षारीय विलयन है | यदि आपको केवल लाल लिटमस पत्र दिया जाता है | तो आप प्रत्येक परखनली में रखे गए पदार्थो की पहचान कैसे करेंगे ?


Class Xth science निम्नलिखित रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए संतुलित समीकरण लिखिए (i) हाइड्रोजन + क्लोरीन ⟶ हाइड्रोजन क्लोराइड (ii) बेरियम क्लोराइड + एलुमिनियम सल्फेट ⟶ बेरियम सल्फेट एलुमिनियम क्लोराइड (iii) सोडियम + जल ⟶ सोडियम हाइड्रोक्साइड + हाइड्रोजन 


RRB GROUP D /NTPC EXAM 2022 : विगत वर्षो में पूछे गए कुछ महत्वपूर्ण सामान्य विज्ञानं के प्रश्न जो RRB GROUP D /NTPC के लिए उपयोगी है ?


गुरुवार, 6 जनवरी 2022

तेल एवं वसायुक्त खाद्य पदार्थ को नाइट्रोजन से युक्त क्यों किया जाता है ?

 तेल एवं वसायुक्त खाद्य पदार्थ को नाइट्रोजन से युक्त क्यों किया जाता है ? 

  उत्तर 

       जब तेल एवं वसायुक्त खाद्य  पदार्थ को जब ज्यादा दिनों तक ऐसे ही छोड़ दिया जाता है | तो ये पदार्थ हवा के संपर्क में आता है और हवा के संपर्क में आने के फलस्वरूप ये उपचयित होकर विकृत गंधित हो जाता है | अर्थात इस खाद्य पदार्थ से ख़राब गंध आने लगती है | तथा उस खाद्य पदार्थ का गंध तथा स्वाद बदल जाता है | जिसके कारण ऐसे खाद्य पदार्थ बर्बाद हो जाता है |

  इसलिए बर्बाद होने से बचाने के लिए तेल एवं वसायुक्त खाद्य पदार्थ को नाइट्रोजन से युक्त किया जाता है |







सोमवार, 3 जनवरी 2022

आपको तीन परखनलियाँ दी गई है | इनमे से एक में आसवित जल शेष दो में से एक में अम्लीय विलयन तथा दसरे में क्षारीय विलयन है | यदि आपको केवल लाल लिटमस पत्र दिया जाता है | तो आप प्रत्येक परखनली में रखे गए पदार्थो की पहचान कैसे करेंगे ?

  आपको तीन परखनलियाँ दी  गई है |  इनमे से एक में आसवित जल शेष दो में से एक में अम्लीय विलयन तथा दसरे में क्षारीय विलयन है | यदि आपको केवल लाल लिटमस पत्र दिया जाता है | तो आप प्रत्येक परखनली में रखे गए पदार्थो की पहचान कैसे करेंगे ? 

    उत्तर 

हम प्रत्येक परखनली में रखे गए पदार्थो की पहचान करने के लिए हम सबसे पहले   प्रत्येक परखनली में  लाल लिटमस पत्र की पट्टी डालते हैं | इससे किसी एक परखनली में लिटमस पत्र का रंग नीला हो जाएगा | इससे यह साबित हो जाएगा कि उस  परखनली में रखी गई  विलयन क्षारीय है | तथा शेष दोनों बची हुई परखनलियो में से एक में आसवित जल होगा तथा एक में अम्लीय विलयन होगा |

    इन दोनों ही परखनलियों के  लिटमस पत्र का  रंगलाल ही रहेगा |

    अब जिस परखनली का रंग नीला हो गया था अर्थात पहचानी गई परखनली से क्षारीय विलयन को बाहर निकालते है | ताकि इसमें विलयन की थोड़ी सी ही मात्रा बची रह जाए |
    अब शेष बची हुई परखनलीयो में से किसी एक के विलयन को डालते है |
    (a)जब लिटमस पात्र पुनः  लाल हो जाता है तो इससे यह सावित हो जाता है  कि इस परखनली में अम्लीय विलयन है | तथा शेष अंतिम परखनली में आसवित जल है |
   (b)जब लिटमस पात्र नीला ही रह जाता है | तो इससे यह सावित होता है कि डाला गया विलयन आसवित जल है | तथा शेष अंतिम परखनली में अम्लीय विलयन है | 


 




रविवार, 2 जनवरी 2022

RRB GROUP D /NTPC EXAM 2022 : विगत वर्षो में पूछे गए कुछ महत्वपूर्ण सामान्य विज्ञानं के प्रश्न जो RRB GROUP D /NTPC के लिए उपयोगी है ?

   RRB GROUP D सामान्य विज्ञानं  के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न जो विगत प्रतियोगी परीक्षाओ में पूछे गए है जो RRB GROUP D के लिए उपयोगी हो सकता है 

चुकी RRB GROUP D 2022 की परीक्षा तिथि घोषित कर दी गई है इसलिए हम इस लेख के माध्यम से हम कुछ महत्वपूर्ण सामान्य विज्ञानं के प्रश्न लेकर आये है जो आपके लिए उपयोगी हो सकती है 

इस लेख में हमने 200 सामान्य विज्ञानक के  प्रश्नो का संग्रह किये है  अगर आपको अच्छा लगे तो कमेंट में माध्यम से हमें बताइये ताकि हम आपके लिए और भी महत्वपूर्ण प्रश्नो का संग्रह करके लेकर आएंगे 


(1) कौन सा विटामिन जल में घुलनशील है  

  B तथा C

(2) शिराएं द्वारा कौन सा रक्त प्रवाहित होता है 

      अशुद्ध रक्त 

(3) पोटैशियम का कार्य क्या है 

यह  ह्रदय की धड़कन एवं नाड़ी संस्थान के कार्यो को संचालित करता है 

(4) ग्लूकोज बिना ऑक्सीजन की उपस्थिति में  मांसपेशियों में प्रतिक्रिया कर क्या बनाता है 

 लैक्टिक अम्ल

 (5) ग्लूकोस बिना ऑक्सीजन की उपस्थिति में बैक्टीरिया या यीस्ट से  प्रतिक्रिया कर क्या बनाता है

 इथाइल अल्कोहल

 (6) ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लूकोज की प्रतिक्रिया होती है तो क्या बनता है

 कार्बन डाइऑक्साइड और जल का निर्माण

 (7) एनिलिडा  में उत्सर्जन उसके किस उत्सर्जन अंग  द्वारा होता है 

              नेफ्रीडिया 

(8)  मूत्र का PH मान क्या होता है 

 6

 (9) सोडियम का कार्य क्या है

 रक्तदाब नियंत्रित करने में सहायक होता है तथा  जल का संतुलन बनाए रखता है

(10) मनुष्य का पाचन क्रिया कहां से प्रारंभ होता है

 मनुष्य का पाचन क्रिया मुख से प्रारंभ होता है

 (11) पौधों के लिए सबसे अच्छा उर्वरक कौन है

 कंपोस्ट

(12)  पेट्रोलियम किस प्रकार की चट्टानों में पाया जाता है

 अवसादी चट्टानों में

 (13) गुब्बारों को  उड़ाने  के लिए काम में लाई जाने वाली गैस कौन है             हिलियम 

(14)  डीडीटी का उपयोग किस रूप में किया जाता है 

कीटनाशी 

 (15) इथेनॉल के अत्यधिक सेवन से कौन सा अंग प्रभावित होता है 

   यकृत 

 (16) लोहा का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत कौन सा है

 हरी सब्जियां

 (17) गैसोलीन को किसके साथ  मिश्रण करके गैसोहाॅल  बनाया जाता है

 इथाइल अल्कोहल

  (18) तत्कालिक ऊर्जा के लिए धावको को कौन सा पदार्थ दिया  जाता है

  ग्लूकोज  

(19) मानव जाति के लिए  ओजोन परत क्यों महत्वपूर्ण है

 ओजोन परत पराबैगनी किरणों को रोकने के लिए एक रक्षा आवरण  बनाती है

 (20) लाल अस्थि मज्जा में किसका निर्माण होता है 

लाल रक्त कणिकाओं का

 (21) शरीर के ताप का नियंत्रण किसके द्वारा होता है

 हाइपोथैलेमस

 (22) गैस की लौ की सबसे गर्म  हिस्से  को क्या कहते हैं 

 ज्योति हीन क्षेत्र

 (23) कशेरुक दंड में कितनी हड्डियां होती है

 33

(24)  एथलीट फुट नामक रोग किस से होती है

 कवक द्वारा

 (25) दमा नामक रोग किस से होता है

 कवक द्वारा

 (26) फाइलेरिया नामक रोग किस कारण होता है  

कृमि द्वारा 

 (27) जब एक वस्तु की गतिज ऊर्जा दुगनी की जाती है तो उसकी  गतिज ऊर्जा

 चौगुनी बढ़ जाती है

 (28) सूत्र कनिका को अन्य किस नाम से भी जाना जाता है

 माइटोकॉन्ड्रिया

 (29) पेनिसिलिन किससे बनाया जाता है

 कवक

  (30) लोंग किससे प्राप्त होती है 

 पुष्प काली से 

 (31) यूरिया अधिकतम मात्रा में पाई जाती है 

मूत्र में 

 (32) पेप्सिन  का एक उदाहरण है 

एंजाइम 

(33)  दूध में नहीं पाया जाता है

 विटामिन सी

 (34) टॉक्सिन है 

एक जहरीला पदार्थ 

(35)  मानव शरीर में रक्त की मात्रा शरीर के भार का होता है

   लगभग 7%

 (36) फलों और सब्जियों में नहीं बताया

 विटामिन डी

(37)  मलेरिया का परजीवी  है

 मादा एनोफीलीज मच्छर 

 (38) मानव मूत्र में उत्सर्जित होता है

 विटामिन सी

 (39) दूध में उपस्थित प्रोटीन है 

कैसीन 

 (40) मेंढक के हृदय में चेंबर होता है 

तीन 

 (41) मानव शरीर का महत्वपूर्ण ग्रंथि है 

पिट्यूटरी ग्रंथि 

 (42) मानव शरीर में प्रचुर मात्रा में पाया है 

 कैल्शियम

 (43) कोशिका का अनुवांशिक पदार्थ

डीएनए 

 (44) अनुवांशिकता के नियम का जन्मदाता है

 ग्रेगरी मेंडल

 (45) कोशिका शब्द का निर्माण किया था 

राबर्ट ब्राउन ने 

(46) मनुष्य के मस्तिष्क के वजन होता है 

1350-1400 ग्राम 

 (47) दूध में पाई जाने वाली शर्करा

 लेक्टोज

 (48) सबसे लंबा कृमि (वर्म ) है 

टेप वर्म 

 (49) जल के घनत्व अधिकतम तथा  आयतन  न्यूनतम होता है

4°C पर 

 (50) समुद्र का जल नीला दिखाई पड़ता है

 प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण

 (52) तारो के टिमटिमाने  का कारण है

 प्रकाश का अपवर्तन 

  (53) रंग का प्रकीर्णन   निर्भर करता है 

तरंगदैध्र्य पर 

(54) ज्योति तीव्रता का मात्रक है 

कैंडिला 

 (55) सूर्य की ऊर्जा का स्रोत है

 नाभिकीय संलयन

 (56) भूस्थिर उपग्रह की पृथ्वी से ऊंचाई होती है 

36000  किमी 

 (57) रेडियो सक्रियता की माप की जाती है

 गीगर मूलर काउंटर से

(58)  रॉकेट की गति आधारित है

 संवेग संरक्षण के सिद्धांत पर 

 (59)सेक्सटैंट का प्रयोग किया जाता है

 ऊंचाई मापने के लिए 

(60) परमाणु बम का सिद्धांत आधारित है

 नाभिकीय विखंडन पर

 (61) बिजली के बल्ब में मुख्यता प्रयोग होता है

 अक्रिय गैस

(62) हाइड्रोजन बम आधारित है

 नाभिकीय संलयन के सिद्धांत

 (63) जल का सर्वाधिक शुद्ध रूप है 

वर्षा जल 

 (64) ग्रीन हाउस प्रभाव गैस है

 कार्बन डाइऑक्साइड

 (65) नाभिकीय विखंडन में प्रयुक्त है

 यूरेनियम

 (66) चंद्रमा पर गुरुत्वीय त्वरण का मान पृथ्वी के मान का

1/6  होता है

 (67) द्रव अवस्था में पाए जाने वाला धातु है 

पारा   

(68) सुराही का पानी ठंडा होता है 

 वाष्पीकरण के कारण

 (69) शुष्क बर्फ कहलाता है 

ठोस  कार्बन डाइऑक्साइड

(70) सबसे  कठोर धातु है 

प्लेटिनम 

 (71) परमाणु के नाभिक में रहता है

 प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन

 (72) पटाखों में हरा रंग होता है

 बेरियम के कारण

 (73) वायुमंडल में नहीं पाए जाने वाला अक्रिय गैस है 

रेडॉन 

 (74) फोटोग्राफी में  उपयोग होता है 

 सिल्वर ब्रोमाइड का

 (75) विद्युत का सबसे अच्छा सुचालक है

चांदी 

 (76) कृत्रिम वर्षा के लिए प्रयोग में लाया जाता है 

सिल्वर आयोडाइड 

 (77) लोहे का सबसे शुद्धतम रूप है 

पिटवां लोहा 

 (78) सबसे कठोर पदार्थ है

हिरा 

 (79) मानव द्वारा संश्लेषित पहला रेशा था 

नायलॉन 

 (80) सबसे हल्की धातु है

लिथियम 

 (81) विटामिन का खोज किसने किया था

फंक ने 

 (82) बच्चों का मानसिक तथा शारीरिक विकास अवरुद्ध हो जाता है  थायरोक्सिन की कमी से

 (83) श्वेत रक्त का औसत जीवनकाल होता है 

2-4 दिन 

 (84) वायुमंडल में नाइट्रोजन कितना प्रतिशत हो 

78 

 (85) स्थाई तथा अस्थाई कठोरता दूर होती है 

 सोडियम कार्बोनेट से 

 (86) हीरा का आपेक्षिक घनत्व तथा अपवर्तनांक होता है  

क्रमशः   2.2 और 2.42 होता है 

 (87) डीएनए का खोज किया था 

वाटसन एवं क्रीक ने 

 (88) किसी वस्तु का भार अधिकतम होता है 

निर्वात में

 (89) अंडे का आवरण बना होता है 

कैल्शियम कार्बोनेट का

 (90) कैप्सूल का आवरण बना होता है 

स्टार्च का 

 (91) तंबाकू में विषैला पदार्थ होता है 

निकोटीन का

 (92) रेफ्रिजरेटर में जल को ठंडा करने के लिए प्रयोग किया जाता है

 अमोनिया गैस का

 (93) चावल को पॉलिश करने से कौन सा विटामिन नष्ट हो जाता है

 थाइमिन ( बी )

 (94) प्याज तथा लहसुन में गंध किस तत्व के कारण होता है

 पोटैशियम 

 (95) सबसे भारी धातु कौन है 

ओसमियम 

 (96) किस पदार्थ को लगाने से रक्त का बहना रुक जाता है 

फेरिक क्लोराइड

 (97) प्राकृतिक वरण का सिद्धांत को किसने प्रतिपादित किया था

 डार्विन ने 

  (98) नींबू में कौन सा अम्ल पाया जाता है

 साइट्रिक अम्ल 

 (99) कौन सा विटामिन  गर्म करने पर नष्ट हो जाता है 

विटामिन C 

 (100) दूध में कौन सा अम्ल पाया जाता है  

लैक्टिक अम्ल 

  (101) एपी कल्चर का संबंध किस क्षेत्र से है 

मधुमक्खी पालन से 

 (102) सेरीकल्चर का संबंध किस क्षेत्र से है 

रेशम उत्पादन है

  (103) प्रोटीन का पाचन किस अंग में होता है 

छोटी आंत (अमाशय )

  (104) हिमोफीलिया किस प्रकार का रोग है 

अनुवांशिक 

 (105) इंसुलिन की खोज किसने की थी 

बैटिंग एवं बेस्ट ने

 (106) गाय के दूध का पीला रंग किसके कारण होता है 

कैरोटीन के कारण 

  (107) मलेरिया का परजीवी क्या होता है 

प्लाज्मोडियम

(108)  पॉलीथिन किसका बहुलक है 

एथिलीन का

 (109) आंसू में कौन सा एंजाइम पाया जाता है 

लाइसोजाइम 

(110) PH  का निर्धारण किसने किया था 

सोरेनसन ने 

 (111) मनुष्य के शरीर में सबसे बड़ी धमनी कौन है

 महाधमनी

(112)  पृथ्वी की आयु का परीकलन  किस विधि द्वारा किया जाता है

यूरेनियम डेंटिंग विधि द्वारा 

 (113) ब्लैक होल सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया

एस. चंद्रशेखर ने

(114)  चिकित्सा शास्त्र का जनक किसे कहा जाता है 

हिमपोक्रेट्स को 

 (115) कुपोषण में सबसे अधिक कमी किस की होती है

 प्रोटीन की

 (116) शरीर में यूरिया किस अंग में बनता है 

यकृत में

(117)  मनुष्य में बुढ़ापा किस ग्रंथि के लुप्त हो जाने के कारण आता है

थायमस ग्रंथि 

 (118) जीवन रक्षक हारमोंस किस ग्रंथि से स्रावित होता है

 एडिनल ग्रंथि

 (119) आर एच फैक्टर का संबंध किससे है

 रक्त से 

(120) मनुष्य के हृदय में कितने प्रकोष्ठ होते हैं 

चार

  (121) अंडा में कौन सा विटामिन नहीं पाया जाता है

 विटामिन सी

  (122) अंडे के किस भाग में प्रोटीन अधिक पाया जाता है

 उजले  भाग

(123)  जीव विज्ञान का जनक किसे कहा जाता है

 अरस्तु को

(124)  रासायनिक दृष्टि से वाटर ग्लास क्या है 

सोडियम सिलीकेट 

 (125) दर्द दूर करने वाली दवाई क्या कहलाती है

 एनाल्जेसिक 

 (126) प्रोटीन किस से बनी होती है 

अमीनो अम्ल से 

 (127) दूध में कौन सी शर्करा पाई जाती है 

लेक्टोज

 (128) अल्जाइमर रोग में मानव शरीर का कौन सा अंग प्रभावित होता है

 मस्तिष्क 

(129) अंडाणु का निषेचन पर प्रायः  किस में होता है 

फेलोपियन ट्यूब में

 (130)  पौधों में जैव  पदार्थ का बहन किसके माध्यम से होता है  

फलोंयम  द्वारा 

  (131) फोटोग्राफी में कौन सा अम्ल प्रयोग किया जाता है 

ऑक्जेलिक अम्ल का 

  (132) पौधों में गैसों का विनिमय होता है

 स्टोमेटा से 

 (133) वर्णांधता की खोज किया था 

होरनर ने  

  (134) कोशिका की खोज किया था 

राबर्ट हुक ने 

  (135) जीवन की सबसे छोटी रचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है

 कोशिका

 (136)   गुणसूत्र का खोज किया था 

 वालडेयर ने 

 (137) शैवालो  का अध्ययन कहलाता है 

 फाइकोलॉजी 

(138)  दही में मौजूद अम्ल है 

लैक्टिक अम्ल

 (139) पौधों में जीवन होने की खोज किसने की थी 

जे .सी. बोस ने

 (140) धोने का सोडा कहा जाता है 

सोडियम बाई कार्बोनेट को

 (141) सर्वाधिक उपग्रहों वाला ग्रह है 

बृहस्पति  ग्रह

 (142) सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है 

 वृहस्पति  ग्रह 

 (143) किस विधि के द्वारा समुद्री जल से नमक प्राप्त किया जाता है 

 वाष्पन  विधि द्वारा

 (144) बादलों में विद्युत आवेश होता है का प्रमाण किसने दिया था

 बेंजामिन फ्रैंकलिन ने  

(145) सबसे बड़ी सजीव पक्षी  है

 शुतुरमुर्ग  

(146) जांघ में पाई जाने वाली हड्डी को कहा जाता है

 फिमर की हड्डी 

 (147) पेनिसिलिन के आविष्कारक थे 

अलेक्जेंडर  फ्लेमिंग 

 (148) एलिसा टेस्ट किस का परीक्षण है

 HIV का 

 (149) रक्ताल्पता किसके अभाव के कारण होता है 

फोलिक एसिड 

 (150) किस विटामिन के कमी के कारण स्कर्वी  रोग होता है 

  विटामिन C 

 (151) हिमोग्लोबिन में कौन सा धातु पाया जाता है 

 लोहा

 (152) क्वांटम सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया था 

मैक्स प्लांक  ने 

 (153) कोशिका का शक्ति गृह  कहा जाता है 

माइटोकॉन्ड्रिया को 

 (154) न्यूट्रॉन की खोज किसने की थी 

चैडविक ने

(155)  एक्स-रे का आविष्कार किसने किया था 

डब्लू . के. रोएन्टजेन  ने

 (156) नवजात शिशु में कितनी हड्डियां होती है 

 लगभग 300

 (157) मानव मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग है 

मेडुला ऑब्लांगेटा 

(158) डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एवं डायग्नोस्टिक का केंद्र अवस्थित है

 हैदराबाद में

 (159) त्वचा की बाहरी परत को कहा जाता है

  एपिडर्मिस 

(160) हृदय के बाहर जाने वाली नलिकाओं को क्या कहा जाता है

 धमनी 

(161)  खून होता है 

क्षारीय 

(162)  हवा की गति किससे मापा जाता है 

एनीमोमीटर से 

 (163) रक्त का कितना प्रतिशत प्लाज्मा है 

55%

 (164) बुलेट प्रूफ जैकेट बनाने के लिए किसका उपयोग किया जाता है

 बोरेक्स का 

(165)  दूध से दही बनाने के लिए कौन सा बैक्टीरिया सहायक है

 लैक्टोबैसिलस 

 (166) वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड लगभग कितने प्रतिशत है

 0.03% 

 (167) लैंडस्टेनर को किस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था

 रक्त समूह 

 (168) टिटनेस रोग होता है

 बैक्टीरिया के कारण

 (169) नमक का रासायनिक नाम है

 सोडियम क्लोराइड 

 (170) विटामिन B1 का रासायनिक नाम है  

 थायमीन

  (171) प्रयोगशाला में तैयार पहला कार्बनिक यौगिक था 

यूरिया 

(172)  रक्त को थक्का बनाने में मदद करता है

 थ्रम्बोसाइट

 (173) मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है

 यकृत 

 (174) कुनैन किस पादप से प्राप्त की जाती है 

सिनकोना से

 (175) यूरेनस ग्रह की खोज किसने की थी 

विलियम हर्शेल ने 

 (176) आनुवंशिकी का जनक किसे कहा जाता है

 मेंडल को 

 (177) मानव में गुणसूत्रों की संख्या कितनी है

 23 जोड़ी

(178) टाइफाइड होने पर कौन सा अंग प्रभावित होता है 

आंत 

(179)  टाइटन एक उपग्रह है 

शनि  का

(180)  गैसों के विसरण का सिद्धांत किसने दिया था

 चार्ल्स ने 

 (181) एक हृदय धड़कन के लिए लगभग कितने समय की जरूरत पड़ती है

 लगभग 0.8 सेकंड

 (182) इलेक्ट्रॉन की खोज का श्रेय किसे दिया जाता है

 जे.जे. थॉमसन को

 (183) अम्लीय वर्षा के लिए उत्तरदाई गैस  कौन से  है 

सल्फर डाइऑक्साइड तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड

(184)  ध्वनि ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपांतरण किससे किया जाता है

 माइक्रोफोन द्वारा 

 (185) पोलियो की बीमारी होती है 

विषाणु से 

 (186) लाल रक्त कण किसमें  नष्ट होता है

 यकृत और प्लीहा में 

 (187) मानव शरीर में सबसे छोटी हड्डी है

 स्टेप्स 

(188)  नींबू के रस का PH मान कितना होता है 

2.2

 (189)  गुरुत्वीय त्वरण का मान अधिकतम होता है 

ध्रुवों पर

 (190)  प्रकाश के वेग को मापा था

 रोमर ने 

(191)  न्यूक्लियस के अलावा कोशिका के किस अंग में डीएनए रहता है

 माइटोकॉन्ड्रिया में 

 (192) तारपीन का तेल किससे प्राप्त किया जाता है 

चीड़ से  

(193) अनैच्छिक मांस पेशियां किसके द्वारा नियंत्रित होती है

 रीढ  की हड्डी द्वारा  

 (194) ब्रह्मांड में सबसे हल्का तत्व कौन सा है

 हाइड्रोजन 

 (195) किस वैज्ञानिक ने रक्त समूह की खोज की थी 

लैंड स्टीनर  ने  

(196) सेकंड लोलक की कालावधी होती है 

 2 सेकंड

 (197) लाल चींटी में कौन सा अम्ल पाया जाता है 

फार्मिक अम्ल  

(198) कैंसर के उपचार के लिए प्रयुक्त अक्रिय  गैस है 

रेडॉन 

(199)  उंगली के नाखून में विद्यमान प्रोटीन है 

ग्लोबिन

(200) टूटी हड्डीओं को जोड़ने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है 

प्लासटर ऑफ़ पेरिस का 


Class Xth science निम्नलिखित रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए संतुलित समीकरण लिखिए (i) हाइड्रोजन + क्लोरीन ⟶ हाइड्रोजन क्लोराइड (ii) बेरियम क्लोराइड + एलुमिनियम सल्फेट ⟶ बेरियम सल्फेट एलुमिनियम क्लोराइड (iii) सोडियम + जल ⟶ सोडियम हाइड्रोक्साइड + हाइड्रोजन

  निम्नलिखित रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए संतुलित समीकरण लिखिए 

   (i)  हाइड्रोजन + क्लोरीन ⟶ हाइड्रोजन क्लोराइड

   (ii)   बेरियम  क्लोराइड  + एलुमिनियम सल्फेट  ⟶ बेरियम सल्फेट  एलुमिनियम क्लोराइड

   (iii)  सोडियम + जल  ⟶ सोडियम हाइड्रोक्साइड + हाइड्रोजन


उत्तर 

   (i) H2+Cl2 ⟶ 2HCl

    (ii) 3BaCl2 + Al2(SO4)^3  ⟶ 3BaSO4+ 2AlCl3

   (iii) 2Na + 2H2O ⟶ 2NaOH + H2 

  


वायु में जलाने से पहले मैग्नीशियम रिबन को साफ किया जाता है क्यों ?

  

 श्वशन को ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया कहा जाता है क्यों ? 


वियोजन अभिक्रिया को संयोजन अभिक्रिया के विपरीत क्यों कहा जाता है ? इन अभिक्रिया के लिए समीकरण लिखें


विस्थापन और द्विविस्थापन अभिक्रिया में क्या अंतर है ? इन अभिक्रियाओं के समीकरण लिखें

शनिवार, 1 जनवरी 2022

विस्थापन और द्विविस्थापन अभिक्रिया में क्या अंतर है इन अभिक्रियाओ को समीकरण लिखें

 विस्थापन और द्विविस्थापन अभिक्रिया में क्या अंतर है इन अभिक्रियाओ को समीकरण लिखें 

 विस्थापन अभिक्रिया - वैसी अभिक्रिया  जिसमें किसी अभिक्रिया के दौरान  किसी लवण  से  उसका एक तत्व किसी अपेक्षाकृत अधिक क्रियाशील तत्व के द्वारा विस्थापित हो जाता है |विस्थापन अभिक्रिया कहलाती है |

      CuSO4 +Zn  ⟶   ZnSO4 +Cu 

            उपर्युक्त उदहारण में CuSO4    से  Cu ,Zn    द्वारा विस्थापित हो जाता है क्योंकि Zn  अपेक्षाकृत अधिक अभिक्रियाशील है |

द्विविस्थापन  -  वैसी अभिक्रिया जिसमे एक नए उत्पादों के निर्माण की लिए दो अभिकारकों  के बीच  आयनो का आदान-प्रदान होता है | 


Na2SO4(aq)+BaCl2(aq) ⟶ BaSO4(s) + 2NaCl(aq)


वायु में जलाने से पहले मैग्नीशियम रिबन को साफ किया जाता है क्यों ?

   श्वशन को ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया क्यों कहा जाता है ?

   वियोजन अभिक्रिया को संयोजन अभिक्रिया के विपरीत क्यों कहा जाता है ? इन अभिक्रिया के लिए समीकरण लिखे

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

वियोजन अभिक्रिया को संयोजन अभिक्रिया के विपरीत क्यों कहा जाता है ? इन अभिक्रिया के लिए समीकरण लिखे

 वियोजन अभिक्रिया को संयोजन अभिक्रिया के विपरीत क्यों कहा जाता है ? इन अभिक्रिया के लिए समीकरण लिखे   

वियोजन अभिक्रिया  - वैसी अभिक्रिया जिसमे कोई बड़े  यौगिक दो या दो से अधिक नए  यौगिक में विघटित हो जाती है वियोजन अभिक्रिया कहलाता है 

                    

      CaCO3 --------- गर्म करने पर ---------→  CaO +  CO2

   संयोजन अभिक्रिया  -  वैसी अभिक्रिया जिसमे दो या दो से अधिक पदार्थ आपस में संयोग करके एक नए पदार्थ का निर्माण करता है संयोजन अभिक्रिया कहलाता है |


      CaO + CO2 -----------→  CaCO3

              

             उपर्युक्त  दिए गए उदाहरणों में दोनों अभिक्रियाएं समान है  लेकिन विपरीत स्थियाँ दिख रही है |

 अतः वियोजन अभिक्रिया को संयोजन अभिक्रिया के विपरीत कहा जा सकता है |  


वायु में जलाने से पहले मैग्नीशियम रिबन को साफ किया जाता है क्यों ?


श्वशन को ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया क्यों कहा जाता है ?


विस्थापन और द्विविस्थापन अभिक्रिया में क्या अंतर है इन अभिक्रियाओ को समीकरण लिखें

 


श्वशन को ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया क्यों कहा जाता है ?

 श्वशन को ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया क्यों कहा जाता है ?

       श्वशन को ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया  कहा जाता है | क्योंकि जब श्वशन क्रिया होती है और   इस क्रिया से प्राप्त ऑक्सीजन जो शरीर के अन्दर लिए जाते है वह भोजन को विघटित करता है अर्थात वह उपचयित होता है इस क्रिया के दौरान ऊर्जा मुक्त होती है | इसलिए श्वशन को ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया कहा जाता है |

गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

वायु में जलाने से पहले मैग्नीशियम रिबन को साफ किया जाता है क्यों ?

   वायु में जलाने से पहले मैग्नीशियम रिबन को साफ किया जाता है क्यों ? 

वायु में जलाने से पहले मैग्नीशियम रिबन को साफ किया जाता है क्योंकि इसकी ऊपरी सतह हट जाये साथ ही साथ  उसके ऊपरी सतह पर उपस्थित धूल कण साफ हो जाए जिससे मैग्नीशियम की सतह हवा के सम्पर्क में आ सके |



 


मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

अपवाह तंत्र किसे कहते है ,भारत के अपवाह तंत्र के बारे में वर्णन करें

 

    अपवाह तंत्र किसे कहते है 

निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जल प्रवाह को अपवाह कहा जाता है तथा इन वाहिकाओं के जाल को अपवाह तंत्र कहा जाता है | अपवाह तंत्र इस क्षेत्र की संरचना और उच्चावच द्वारा प्रभावित होता है |




                        जल ग्रहण क्षेत्र 

जब एक नदी विशिष्ट क्षेत्र से अपना जल बहाकर लाती है तो उसे जलग्रहण क्षेत्र कहते है | एक नदी एवं उसकी सहायक नदियो द्वारा अपवाहित क्षेत्र को अपवाह द्रोणी कहा जाता है | 

                         जल विभाजक 

जब एक अपवाह द्रोणी को दूसरे से अलग करनेवाली सिमा को जल विभाजक कहा जाता है | बड़ी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को नदी द्रोणी कहा जाता है जबकि छोटी नदियों द्वारा व नालो द्वारा अपवाहित क्षेत्र को जल सम्भर  कहा जाता है | 

            अपवाह प्रतिरूप क्या है ?

 किसी नदी बेसिन में प्रवाह रेखा जाल के दृश्य स्वरूप को अपवाह प्रतिरूप कहते हैं | भारत में भौगोलिक विषमताओं के कारण निम्न प्रवाह  प्रतिरूप है 

                      अध्यारोपित अपवाह 

 नदी घाटी का निर्माण सर्वप्रथम ऊपरी आवरण पर होता है इसके बाद  नदी निम्न कटाव द्वारा निर्मित घाटी का विस्तार तथा विकास निचली संरचना पर करती है |  ऐसी अवस्था में ऊपरी आवरण वाली घाटी का निकली संरचना पर आरोपन कर दिया जाता है |  सोन सवर्णरेखा   एवं बनास अध्यारोपित नदियां हैं | 

                      पूर्ववर्ती अपवाह 

 इस अपवाह प्रणाली में वैसी नदियां शामिल होती है जो हिमालय के उत्थान से पहले की होती है वे प्रवाहित होने के क्रम में उत्थान के साथ-साथ कटाव जारी रखती है तथा गहरे गार्ज एवं महाखड्ड का  निर्माण करती है |  इस प्रकार की पूर्ववर्ती नदियों में सिंधु , सतलुज , ब्रह्मपुत्र एवं अरुण आदि प्रमुख है | 

                        परवर्ती अपवाह 

 अनुवर्ती सरिताओं  के बाद उत्पन्न तथा कटको के अक्षों  का अनुसरण करने वाली नदियां परवर्ती सरिता है |  चंबल , केन , सिंधु बेतवा , सोन आदि नदियां गंगा व यमुना से समकोण  पर मिलती है | 

                      अनुगामी अपवाह 

 यह नदियां धरातलीय ढाल व संरचना के अनुसार बहती  है |अधिकांश प्रायद्वीपीय नदियां अनुगामी है |  गोदावरी , कृष्णा व  कावेरी नदिया बंगाल की खाड़ी में गिरती है जबकि पेरियार , शरावती व पोन्नानी  पश्चिमी घाट से निकलकर अरब सागर में गिरती है |  नर्मदा व तापी भी भ्रंश घाटी से होकर अरब सागर में गिरती है | 

                    अन्तः स्थलीय अपवाह 

 वैसे नदियां जो सागर तक नहीं पहुंच पाती है बल्कि मार्ग में ही लुप्त  हो जाती है अन्तः स्थलीय  अपवाह का निर्माण करती है | 

                        खंडित अपवाह 

 हिमालय के पाद  प्रदेश में उतरने वाली अनेक नदियां भावर में लुप्त  होकर आगे पुनः  धरातल पर प्रकट होती है | डेल्टा के निकट नदियाँ कई धाराओं में बंटकर गुम्फित  प्रारूप में बहती है इसलिए इसे खंडित अपवाह कहा जाता है | 

                     जालीनुमा अपवाह 

 जालिनुमा अपवाह तंत्र का विकास तब होता है जब मुख्य नदियां समानांतर बहती है तथा सहायक नदियां  समकोण पर मिलती हुई  जाल का निर्माण करती  हैं | सिंहभूम क्षेत्र में जालीदार आपवाह मिलता है | 

                       अरीय अपवाह 

 जब नदियां  किसी पर्वत से निकलकर सभी दिशाओं में बहती हो तो इसे अरीय अपवाह कहा जाता है |  अमरकंटक श्रेणी  से निकलने वाली नर्मदा , सोन तथा महानदी अरीय अपवाह के उदाहरण है | 

                       सामानांतर अपवाह 

जब  अनेक नदियां एक दूसरे के समानांतर प्रवाहित होती हुई प्रादेशिक ढाल का अनुसरण करती है   तो उसे समानांतर अपवाह कहा जाता है |  गंगा के ऊपरी मैदान में समानांतर  अपवाह पाया जाता है | 

                     आयताकार अपवाह 

 जब सहायक नदियां अपने मुख्य नदी से समकोण  पर मिलती है तो इस अपवाह प्रतिरूप को आयताकार अपवाह  कहा जाता है | 

     भारत के अपवाह तंत्र के बारे में वर्णन करें 

 किसी भी देश का अपवाह तंत्र वहां के उच्चवाच  तथा भूमि के ढाल  पर निर्भर करता है | भारत एक विशाल देश है | इसके उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में प्रायद्वीपीय  पठार है  जिसके बीच उत्तरी भारत का विशाल मैदान है | 

भारत के अपवाह तंत्र को कितने भागो में बाँटा जा सकता है 

 भारत के अपवाह तंत्र को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है   

   (1) हिमालयी अपवाह तंत्र 

  (2) प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र 

               (1) हिमालयी अपवाह तंत्र 

 भूगर्भवेताओं ने  हिमालयी  नदी तंत्र के उद्भव की व्याख्या इण्डो -ब्रंहा  परिकल्पना के आधार पर की है   जिसके अनुसार मध्य हिमालय  की उत्पत्ति के समय ब्रह्मपुत्र नदी का जल मध्य हिमालय के दक्षिण पर्वत पाद के सहारे पूर्व से पश्चिम प्रवाहित होकर वर्तमान पाकिस्तान की सिंधु नदी में मिलकर अरब सागर में जो साथ था इसे ही इण्डो - ब्रह्ना  या  शिवालिक नदी कहा जाता था  शिवालिक श्रेणी की उत्पत्ति के समय अरावली - दिल्ली कटक ऊपर उठा जिससे इण्डो ब्रह्ना  नदी छिन्न भिन्न   होकर वर्तमान तीन नदी तंत्र में विभाजित हो गई | 

     (i)  सिंधु  अपवाह तंत्र  (ii) गंगा अपवाह तंत्र  (iii)  ब्रह्मपुत्र अपवाह तंत्र

                   (i)  सिंधु  अपवाह तंत्र  

 भारत के उत्तर पश्चिम भाग में सिंधु तथा उसकी सहायक नदियां विस्तृत क्षेत्र को अपवाहित  करती है

 हिमालय से निकलने वाली सिंधु अपवाह तंत्र की  प्रमुख नदिया निम्नलिखित है

                              सिंधु नदी

 सिंधु नदी का उद्गम स्थल तिब्बती  क्षेत्र में कैलाश पर्वत श्रेणी में स्थित बोशवर  न्यू हिमानी के निकट होता है |  तिब्बत में इसे सिंगी खम्बान  अथवा शेरमुख कहा जाता है |  यह  2880 किलोमीटर लंबी है जिसमें भारत में केवल 709 किलोमीटर लंबी है तथा इसका संग्रहण क्षेत्र 11.65 वर्ग किलोमीटर है | यह भारत में 3.21 लाख वर्ग किमी है |  भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सिंधु जल समझौता के अंतर्गत भारत सिंधु  व उसकी सहायक नदियों में झेलम और चिनाब के  20% जल का उपयोग कर सकता है | 

 सिंधु नदी की बाई ओर से मिलने वाली नदियों में पंजाब की पांच नदियां सतलुज , व्यास , रावी , चिनाब  और झेलम  मिलकर पचनद  बनाती है |  यह पांचो नदिया संयुक्त रूप से सिंधु नदी की मुख्यधारा से मिथनकोट जो पाकिस्तान में स्थित है के निकट मिलती है | 

                                झेलम नदी

 झेलम नदी कश्मीर घाटी के दक्षिण पूर्व में 4900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बेरीनाग के निकट स्थित एक झरने से निकलती है | यह बुलर झील से होती हुई पाकिस्तान सीमा के पास एक गहरा महाखड़ बनाती है तथा ट्रिग्मु  के पास चिनाब से मिल जाती है |  मुजफ्फराबाद के बाद यह  नदी भारत और पाकिस्तान के बीच 170 किलोमीटर लंबी सीमा बनाती है |  भारत में इसकी लंबाई 724 किलोमीटर है इसे वितस्ता  भी कहा जाता है | 

                            सतलुज नदी

 सतलुज नदी की उत्पत्ति तिब्बत से 4630 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मानसरोवर के निकट राकसताल से होती है ,  जहां इसे लॉगचेन खम्बाब  के नाम से जाना जाता है |  यह शिपकी ला दर्रा के पास हिमाचल प्रदेश में प्रवेश करती है | स्पीति  नदी इसकी प्रमुख सहायक नदी है |  प्रसिद्ध भाखड़ा नांगल बांध सतलुज नदी पर स्थित है | इस नदी की कुल लंबाई 1450 किलोमीटर है जिसमें भारत में 1050 किलोमीटर है |  किसे शातुर्दि  भी कहा जाता है | 

                              चिनाब नदी

 चिनाब नदी का उद्गम स्थल हिमाचल प्रदेश के लाहौल जिले के बारालाचा दर्रे के दोनों ओर स्थित है यह बारा शिग्री ग्लेशियर से बहुत अधिक मात्रा में जल प्राप्त करती है |  सिंधु नदी की भारत में सबसे लंबी सहायक नदी है | इसकी लंबाई 1180 किलोमीटर है | इसे चंद्रभागा भी कहा जाता है | 

                            रावी नदी

 रावी नदी का उद्गम स्थल  हिमाचल प्रदेश के कुल्लू पहाड़ियों में रोहतांग दर्रे के समीप है | इसकी घाटी को चम्बा घाटी कहा जाता है | यह पाकिस्तान में सराय सिंधु के पास चिनाब से मिल जाती है | इस नदी की कुल लंबाई 725 किलोमीटर है |  इसे परुषणी भी कहा जाता है | 

                          व्यास नदी

 इस नदी का उद्गम स्थल रोहतांग दर्रे के पास ब्यास कुण्ड से होता है | यह नदी कुल्लू घाटी से गुजरती है |  इस नदी की कुल लंबाई 460 किलोमीटर है | इसे बिपाशा के नाम से भी जाना जाता है |

                     (ii) गंगा अपवाह तंत्र 

 गंगा नदी तंत्र का विस्तार देश के लगभग एक चौथाई क्षेत्र पर पाया जाता है | इससे उपजाऊ मैदान का निर्माण होता है जो भारत का अन्न भंडार है | इस अपवाह तंत्र में गंगा और उसकी सहायक नदियां सम्मिलित हैं | इन सहायक नदियों में एक ओर तो वे हैं जो हिमालय के हिमाच्छादित  क्षेत्रों से निकलती है  और दूसरी ओर वो है जो प्रायद्वीपीय  प्रदेश से आती है | 

                             गंगा नदी 

 गंगा नदी का उद्गम उत्तराखंड के उत्तरकाशी जनपद के 3900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गोमुख के निकट गंगोत्री हिमनद से होता है | यहां इसे भागीरथी कहा जाता है | देवप्रयाग में भागीरथी अलकनंदा से मिलती है |  इसके बाद दोनों  की संयुक्त धारा को गंगा के नाम से जाना जाता है | अलकनंदा की दो धाराएं धौलीगंगा एवं विष्णु गंगा विष्णुप्रयाग के निकट परस्पर मिलती है | बाद में इसमें पिंडर नदी कर्णप्रयाग के पास और मंदाकिनी रुद्रप्रयाग के पास मिलती है |

 हरिद्वार के पास गंगा मैदान में प्रवेश करती है जहां से  इलाहाबाद तक इसकी दिशा दक्षिण व  दक्षिण पूर्व की होती है | इलाहाबाद से फरक्का तक इसके प्रवाह की दिशा पूर्व की ओर है  फरक्का से आगे इसके मुख्य धारा दक्षिण पूर्व को प्रवाहित होती हुई बांग्लादेश में प्रवेश कर जाती है | यहां गंगा को  पदमा के नाम से जाना जाता है |

 गंगा नदी के उत्तर में हिमालय से तथा दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार से कई सहायक नदियां आकर मिलती है | इसमें कुछ सदानीरा तथा कुछ बरसाती नदियां हैं बाएं तट पर आकर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियों में राम गंगा , गोमती , टोंस , घाघरा , गंडक, बागमती और कोसी  है | दाहिने तट के सहारे मिलने वाली नदियों में यमुना , सोन , पुनपुन , दामोदर और रूपनारायण शामिल है |

                               यमुना नदी 

 यमुना नदी गंगा की सबसे प्रमुख सहायक नदी है तथा यह   यमुनोत्री हिमनद से निकलती है  | यह गंगा के समानांतर बहती हुई इलाहाबाद के निकट गंगा में मिल जाती है | इसकी कुल लंबाई 1326 किलोमीटर है | दक्षिण में विंध्याचल पर्वत से निकलकर चंबल , काली , सिंध , बेतवा , केन रिन्द , सेंगर तथा वरुणा नदियां इसमें आकर मिलती है |

                              चम्बल नदी 

 चंबल नदी मध्य प्रदेश के मालवा पठार में महू के निकट से निकलती है और उत्तर मुखी होकर एक महाखड से बहती  हुई राजस्थान में कोटा पहुंचती है  जहां से आगे यह है | यमुना नदी  में मिल जाती है | चंबल अपनी उत्खात भूमि  वाली भू-आकृति के लिए प्रसिद्ध है | जिसे चंबलखड़ कहा जाता है  इसकी लंबाई 965 किलोमीटर है | काली , सिंध , बनास , पार्वती व क्षिप्रा  इसकी प्रमुख सहायक नदियां  है |

                           घाघरा नदी 

 घाघरा नदी तिब्बत  के पठार में स्थित मापचाचुंग  हिमनद से निकलकर  नेपाल में बहने  के बाद यह  भारत में प्रवेश करती है |   इस नदी में प्राया बाढ़ आती है |

                              कोसी नदी

 कोसी नदी तीन नदियों के मिलने से बनती है | यह नदियां सिक्किम नेपाल तथा तिब्बत के हिमाच्छादित  प्रदेशों से निकलती है | यह नदी मार्ग परिवर्तन तथा आकस्मिक बाढ़ के लिए  प्रसिद्ध है | लगभग 200 वर्ष पूर्व यह  नदी पूर्णिया जिले के निकट होकर प्रवाहित हुआ करती थी | लेकिन अब यह इस स्थान से 160 किलोमीटर पश्चिम की ओर से होकर जाती है | कोसी नदी में अचानक जल स्तर बढ़ जाता है जिससे भयंकर बाढ़ आती रहती है इसलिए इसे  बिहार का शोक नदी  कहा जाता है |

                              गण्डक नदी 

 गंडक नदी दो धाराओं काली गंडक और त्रिशूल गंगा के मिलने से बनती हैं | यह नदी धौलागिरी व  माउंट एवरेस्ट के बीच से निकलती है | यह नदी बिहार के चंपारण जिले में यह मैदान में प्रवेश करती है | और पटना के निकट सोनपुर में गंगा नदी में जाकर मिलती है |

                              रामगंगा नदी

 यह गैरसैण के निकट गढ़वाल की पहाड़ियों से निकलती है | नजीबाबाद के निकट मैदान में प्रवेश करती है |  और अंत में कन्नौज के निकट गंगा नदी में मिल जाती है |

                              दामोदर नदी

 यह छोटा नागपुर पठार के पूर्वी किनारे पर दामोदर नदी बहती है | और भ्रंश घाटी से होती हुई हुगली नदी में गिरती है | बराकर इसकी मुख्य सहायक नदी है |  दामोदर नदी को बंगाल का शोक नदी कहा जाता था | 

                                सरयू नदी

 सरयू नदी का उद्गम स्थल नेपाल हिमालय में मिलाम हिमनद में है | इसे गौरी गंगा के नाम से जाना जाता है | भारत-नेपाल सीमा के साथ बहती हुई जहां इसे काली या चाइक  कहा जाता है |

                              महानन्दा नदी

 यह नदी दार्जिलिंग पहाड़ियों से निकलती है | और पश्चिम बंगाल में गंगा के बाएं तट पर मिलने वाली अंतिम सहायक नदी है |

                            सोन नदी

 यह अमरकंटक पहाड़ से निकलती है | यह गंगा के दक्षिणी तट की सहायक नदी है | पठार के उतरी किनारों पर जलप्रपातों  की श्रृंखला बनाती हुई यह नदी पटना के समीप आरा के पास गंगा नदी में मिलती है |

                     (iii)  ब्रह्मपुत्र अपवाह तंत्र

 ब्रह्मपुत्र अपवाह का विस्तार भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में है यहां  ब्रह्मपुत्र  तथा इसकी सहायक नदियां विस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करती है |

                          ब्रह्मपुत्र नदी

 ब्रह्मपुत्र नदी कैलाश पर्वत श्रेणी में मानसरोवर झील के निकट स्थित चेमायुंगडुंग  हिमानी से निकलती है | यहाँ से यह सांगपो नाम से  महान हिमालय श्रेणी के समानांतर पूर्व की ओर 1100 किलोमीटर तक अनुदैर्ध्य  घाटी में प्रवाहित होती है | नामचा बरुआ  के निकट मध्य  हिमालय को काटकर एक महाखड्ड  का निर्माण करती है |और दिहांग  नाम से अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है |

 सादिया के पास दिबांग और लोहित नदियां बाएं किनारे पर आकर मिलती है | इसके बाद इसे ब्रह्मपुत्र नाम से जाना जाता है | इसके बाद यह  असम घाटी में प्रवेश करती है जहां कई सहायक नदियां मिलती है |

 धुबरी  के निकट ब्रह्मपुत्र दक्षिण की ओर मुड़कर बांग्लादेश में प्रवेश करती है | जहाँ इसे  जमुना के नाम से जाना जाता है |

 बांग्लादेश में यह  गंगा के साथ मित्र गंगा ब्रह्मपुत्र नामक विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा बनाती है |

 असम के अधिकांश भाग में ब्रह्मपुत्र गुम्फित  नदी है यह अपने साथ बहुत से अवसाद लाती है और इसमें नदी विसर्प भी बहुत है | इसमें बहुत से द्वीप भी है | जिसमें सबसे प्रमुख माजुली द्वीप है |  यह लगभग 90 किलोमीटर लंबा  और 20 किलोमीटर चौड़ा है |  यह  विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप है |

                              बराक नदी

 मणिपुर की पहाड़ियों से यह नदी निकलती है जिसे बराक  के नाम से जाना जाता है | यह दक्षिणी असम , मणिपुर एवं मिजोरम में प्रवाहित होती है | यह नदी बांग्लादेश में प्रवेश करके मेघना में मिल जाती है |

                (2) प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र 

 प्रायद्वीपीय पठार एक विस्तृत क्षेत्र है यह प्राचीन व  स्थित भूखंड है | अतएव  प्रायद्वीप की नदियां हिमालय की तुलना में अधिक पुरानी है | इसका सामान्य ढाल पूर्व की ओर है | इसलिए अधिकांश नदियां पश्चिमी घाट से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है |

         बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियां 

                             महानदी

 महानदी छत्तीसगढ़ में रायपुर जिले के सिहावा के निकट अमरकंटक श्रेणी से निकलती है |  और उड़ीसा से होकर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती है | इस  नदी की कुल लंबाई  857 किलोमीटर है एवं इसकी प्रमुख सहायक नदियां इब , माण्ड , हमदो , तथा केन है  इस नदी पर हीराकुंड बांध बना हैै |

                         गोदावरी नदी 

 गोदावरी प्रायद्वीपीय पठार की सबसे लंबी नदी है | इसकी लंबाई 1465 किलोमीटर है | यह महाराष्ट्र   के नासिक जिले में त्रियंबकेश्वर से निकलती है | दामोदर नदी को दक्षिण की गंगा या बृद्ध या बूढी  गंगा भी कहा जाता है |

                         कृष्णा नदी

 कृष्णा नदी की उत्पत्ति सह्याद्रि  में महाबलेश्वर के निकट एक झरने से होती है | इसका अपवाह तंत्र महाराष्ट्र ,  कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश में विस्तृत है | किस की कुल लंबाई 1400 किलोमीटर है कोयन , भीमा , मूसी , मुनेरु ,  घाटप्रभा , मालप्रभा , वारना , पंचगंगा , दूधगंगा व तुंगभद्रा  इसकी प्रमुख सहायक नदियां है | यह नदी एक बड़े डेल्टा का निर्माण करती है |

                          कावेरी नदी 

  यह नदी पश्चिमी घाट में कर्नाटक के कोडागु जिले में ब्रह्मागिरी श्रेणी से निकलती है | और कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों में बहती हुई कावेरिपट्टनम के निकट बंगाल की खाड़ी में गिरती है |

 कावेरी नदी को दक्षिण की गंगा ही कहा जाता है |

 इसकी कुल लंबाई 800 किलोमीटर है |

                   स्वर्णरेखा एवं ब्राह्मणी नदी

 सुवर्णरेखा एवं ब्राह्मणी नदीया छोटा नागपुर पठार पर  रांची के दक्षिण पश्चिम से निकलती है | ब्राह्मणी नदी कोयल और शंख नदियों के  मिलने से बनी है | जिसकी लंबाई 705 किलोमीटर है स्वर्ण रेखा की लंबाई 395 किलोमीटर है |

                           पेन्नार नदी

          पेन्नार नदी कर्नाटक के कोलार जिले की नन्दी दुर्ग पहाड़ी से निकलती है | इस का अपवाह क्षेत्र कृष्णा एवं कावेरी के मध्य स्थित है |

                          वंशधारा  नदी

 यह महानदी और गोदावरी के बीच पूर्व की ओर प्रवाहित होने वाली नदी है जो बंगाल की खाड़ी में अपना जल प्रवाहित करती है | उड़ीसा के कालाहांडी व रायगढ़ जिलों की सीमा से निकलकर 254 किलोमीटर तक बहते हुए आंध्रप्रदेश के कलिंगपतनम में बंगाल की खाड़ी में गिरती है |

        अरब सागर में गिरने वाली नदियां

                            नर्मदा नदी

 यह नदी मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ की सीमा के निकट अमरकण्टक नामक पहाड़ी से निकलकर भाड़ौच के निकट अरब सागर की खाड़ी खंभात में जाकर गिरती है | इसकी कुल लंबाई 1312 किलोमीटर है | इसके उत्तर में विंध्याचल तथा दक्षिण में सतपुड़ा पर्वत है | यह नदी जबलपुर के निकट धुआंधार जलप्रपात का निर्माण करती है |

                            तापी नदी 

 यह नदी मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में महादेव की पहाड़ियों के दक्षिण से निकलती है | इसकी कुल लंबाई 724 किलोमीटर है | इसका बेसिन मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र तथा गुजरात में फैला हुआ है | यह नर्मदा के समानांतर पश्चिम दिशा में बहती हुई खंभात की खाड़ी में विलीन हो जाती है |

                             साबरमती नदी

 इसका उद्गम स्थल अरावली की पहाड़ियों में राजस्थान के  डुंगरपुर जिले में स्थित है | यहां से यह दक्षिण पश्चिम की दिशा में 320 किलोमीटर की दूरी तय करके खंभात की खाड़ी  में विलीन हो जाती है |

                            माही नदी 

 नदी की उत्पत्ति विंध्याचल पर्वत से होती है यह 533 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद यह खंभात की खाड़ी में गिरती है |

                       अन्त: प्रवाही नदी

 यह नदी राजस्थान में अजमेर के दक्षिण पश्चिम से निकलकर 320 किलोमीटर के पश्चात कच्छ के रण में दलदली क्षेत्र में विलुप्त हो जाती है | इस प्रकार यह अन्त: प्रवाह का उदाहरण प्रस्तुत करती है |


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बुधवार, 1 दिसंबर 2021

भारतीय कृषि के बारे में वर्णन करे

          भारतीय कृषि  के बारे में वर्णन करे 







  कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक व्यवस्था का प्रमुख आधार है  एक ओर जहां यह  भारत की अधिकांश जनसंख्या को प्रभावित करती है वहीं दूसरी ओर यह  भारतीय जलवायु , मृदा एवं संस्थागत कारको से भी प्रभावित होती है  |

 भारत एक कृषि प्रधान देश अभी भी यहां की आधी से अधिक जनसंख्या का भरण पोषण कृषि पर निर्भर है  | यद्यपि सकल राष्ट्रीय उत्पादन में कृषि का अंशदान 60% से घटकर 16.9% पहुंच गया है फिर भी इसकी  भूमिका महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लगभग 60% जनसंख्या के रोजगार का स्रोत है औद्योगिक क्षेत्र की प्रगति और उपलब्धि भी  कृषिगत कच्चे माल पर ही निर्भर करती है |

 भारत के कुल 328.726 मिलियन हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से 195.10 मिलियन  हेक्टेयर क्षेत्र पर कृषि की जाती है जबकि इसमें से  139.9 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र शुद्ध  बुआई क्षेत्र है  अर्थात यहां वास्तविक रूप से खेती होती है पिछले 60 वर्षों में शुद्ध बुवाई क्षेत्र में तीव्र गति से वृद्धि हुई है |

 स्थानीय तौर पर पंजाब , हरियाणा  पश्चिम बंगाल  उत्तर प्रदेश  , बिहार , कर्नाटक  और महाराष्ट्र का  55% से अधिक प्रतिवेदित  क्षेत्र शुद्ध बुआई  क्षेत्र के रूप में पाया जाता है |

   भारतीय कृषि के करने के कई प्रकार है 

                             उतेरा कृषि 

 यह फसल उगाने की पारंपरिक  पद्धति है जिसमें दूसरी फसल की बुआई पहली फसल के कटने से पूर्व ही कर दी जाती है | दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि यह  एक सघन  फसल कृषि की एक   प्रकार है  इस प्रकार की कृषि  के लिए  दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है इसमें धान मुख्य फसलें होती है बाकी अन्य को इसके साथ उगाया जाता है  वर्तमान समय में बढ़ती जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति मे यह कृषि बहुत लाभदायक है |

                             शुष्क कृषि

  शुष्क  कृषि  मूलतः  नाजुक ऊंची जोखिम वाली कम उत्पादक कृषि पारिस्थितिक तंत्र से संबंध है भारत के कृषि  परिदृश्य में शुष्क  क्षेत्रीय कृषि का विशेष स्थान है | देश में ये वे  कृषि क्षेत्र है जहां वार्षिक वर्षा की मात्रा 75 सेंटीमीटर से कम पाई जाती है | क्षेत्र का विस्तार लगभग देश के कृषि क्षेत्र का 22% भाग समाहित है इसका 60% भाग राजस्थान  , 20%  भाग गुजरात एवं शेष पंजाब , हरियाणा , महाराष्ट्र , आंध्र प्रदेश और कर्नाटक राज्य में पाया जाता है | इन  क्षेत्रों में वर्षा कम एवं  अनिश्चित पाई जाती है जिसके कारण यह क्षेत्र हमेशा सूखे की चपेट में आते रहता है |

                               आर्द्र कृषि

 आर्द्र कृषि 75 सेंटीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाती है इन क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के अंतर्गत वर्षा जल पौधों की जरूरत से अधिक होता है | यह प्रदेश बाढ़ तथा मृदा अपरदन का सामना करता है इन क्षेत्रों में वैसे फसल उगाई जाती है | जिन्हें पानी की अधिक मात्रा में  आवश्यकता  होती है |

 जैसे चावल,  जुट ,  गन्ना आदि की  कृषि  यहां की जाती है

                     व्यापारिक कृषि

 व्यापारिक कृषि भारतीय कृषि की एक नई विशेषता है | वैश्वीकरण के प्रभाव के कारण कुछ क्षेत्रों में किसान गहन  निर्वाह कृषि से व्यापारिक कृषि की ओर उन्मुख हुए हैं |  यह कृषि व्यवसाय के उद्देश्य से की जाती है स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय कृषि में कई प्रकार के परिवर्तन आए हैं | जैसी प्रौद्योगिकी का स्तर ऊंचा हुआ है | कृषि के  मशीनीकरण में वृद्धि हुई है | किसान आर्थिक रूप से इतना समृद्ध हो गया है कि वह रासायनिक उर्वरक तथा उत्तम बीज खरीद सके उसके लिए सिंचाई , विद्युत तथा ऋण की भी व्यवस्था होने लगी है | प्रति हेक्टेयर तथा प्रति कृषक उपज में वृद्धि हुई है | अतः   हमारी कृषि आदिकालीन जीविका के दौर से बाहर निकल आई है | परंतु अभी भी  अधिकांश किसानों के पास बेचने  के लिए अतिरिक्त उत्पाद नहीं बच पाते  इस प्रकार भारत के अधिकांश क्षेत्रों में अब भी जीविका के रूप में ग्हण कृषि की जाती है |

                          रोपण कृषि

 रोपण कृषि का प्रारंभ ब्रिटिश कंपनियों द्वारा औपनिवेशिक काल में शुरू किया गया जिसमें केवल  बाजार में बेची जाने वाली  नगदी  फसलों  को उगाया  जाता है इसके अंतर्गत रबड़ , चाय , कोला , मसालों , नारियल , कॉफी  आदि की फसलें उगाई जाती है इसमें वैज्ञानिक तरीकों से मशीनों का प्रयोग कर श्रमिकों की सहायता से कृषि की जाती है |

                            जैविक कृषि

 भारत में परंपरागत कृषि पूरी तरह से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर आधारित है | यह विषाक्त तत्व हमारी खाद्य पूर्ति व  जल स्रोतों में नी: सृत  हो जाते हैं | और हमारे पशुधन को हानि पहुंचाते हैं साथ में ही इस कारण मृदा के  उर्वरता भी कम हो जाती हैं |  अतः   विकास की धारणीयता के लिए पर्यावरण मित्र प्रौद्योगिकी विकास के प्रयास अनिवार्य हो गया है |  ऐसा ही एक प्रौद्योगिकी को जैविक कृषि कहा जाता है | अर्थात जैविक कृषि खेती करने की  वह  पद्धति है जो पर्यावरणीय संतुलन को पुनः स्थापित करके उसका संरक्षण और संवर्धन करती है | विश्व भर में सुरक्षित आहार की पूर्ति बढ़ाने के लिए जैविक विद्या से उत्पादित खाद्य पदार्थों की मांग में वृद्धि हो रही है |

              प्रसंविदा कृषि ( कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग )

  कृषको  के द्वारा किसी समझौते के तहत कृषि करना जो उत्पादक तथा उत्पादन के क्रेता को लाभ पहुंचाए प्रसंविदा कृषि  अर्थात कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कहा जाता है | समझौते की शर्तों के अनुसार इसके अनेक मॉडल हो सकते हैं सामान्यता है यह देखा जाता है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का एक पक्ष  तो किसान तथा दूसरा पक्ष कंपनी या संस्था होती है  जो कृषि उत्पाद का एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का समझौता करती है | तथा कृषक को उत्तम कोटि के बीज , उर्वरक , सिंचाई आदि की पूर्ति करता  हैं |

 इस प्रकार इस स्थिति में कृषक अपने लिए नहीं अपने  इच्छा से भी नहीं बल्कि  प्रसंविदा की दूसरी पार्टी के निर्देश पर उत्पादन करता है | इस स्थिति में किसानों को  विशेष रूप से छोटे तथा सीमांत किसानों को भी वे सभी सुविधाएं मिल जाती है | जो उन्हें व्यक्तिगत स्थिति में प्राप्त नहीं हो पाती है | इसके अंतर्गत  कृषक को अच्छी गुणवत्ता का आगत ,  आवश्यकता पड़ने पर ऋण  तथा उत्पाद के लिए सही मूल्य सही समय पर बिना किसी कठिनाई के मिल जाता है |

          भारत की फसल ऋतु के बारे में चर्चा करें .....

 भारत की भौतिक संरचना  ,जलवायु एवं मृदा संबंधी विभिन्नतायें   ऐसी है जो विभिन्न प्रकार की फसलों की कृषि को  प्रोत्साहित करती है भारत की तीन प्रमुख  ऋतू  फसल है |

                 खरीफ फसल

 खरीफ फसल वर्षा काल की फसलें हैं जो जून-जुलाई में दक्षिण पश्चिम मानसून के प्रारंभ होने के साथ  बोई  जाती है | तथा सितंबर अक्टूबर तक काट ली जाती है | इसमें उष्णकटिबंधीय फसलें शामिल है जिसके अंतर्गत चावल , ज्वार,  बाजरा , मक्का , जूट ,  मूंगफली , कपास, सन ,  तंबाकू , मूंग ,  आदि की कृषि की जाती है |

                  रबी  फसल

 रबी फसल सामान्यतः अक्टूबर में बोई जाती है और मार्च में काट दी जाती है  इस ऋतु में सिंचाई की आवश्यकता ज्यादा पड़ती है इसके अंतर्गत प्रमुख फसलें गेहूं , चना , मटर , सरसों , राइ  आदि है |

                 जायद फसल

 जायद एक अल्पकालीन एवं ग्रीष्मकालीन फसल है | जो रबी एवं खरीफ के मध्यवर्ती काल में अर्थात अप्रैल में बोई जाती है | और जून तक काट ली जाती है | इसमें सिंचाई की सहायता से सब्जियों , खरबूजा , ककड़ी , खीरा , करेला आदि की कृषि की जाती है  मूंग और कुल्थी  जैसे दलहन फसलें भी इस समय उगाई जाती है |

           भारत की प्रमुख फसलों के बारे में वर्णन करें ....


 भारत की प्रमुख फसलों को कई भागों में बांटा जाता है जैसे खाद्यान फसले , दलहन फसले , तिलहनी फसलें एवं नगदी फसलें

                  भारत की खाद्य फसलें 

 भारत अधिक जनसंख्या वाला देश है | जिसके लिए भोजन पूर्ति के कारण भारतीय कृषि में  खाद्यान्न फसलों की  प्रधानता पाई जाती है जो संपूर्ण कृषि क्षेत्र की 61% भाग को अधिकृत किए हुए हैं इन  खाद्य फसलों में अनाज और दालें है ₹ जिसमें चावल , गेहूं,  ज्वार,  बाजरा , मक्का , जो ,रागी , चना और अरहर प्रमुख है |

                                चावल 

 चावल एक खाद्य फसल है जिसकी कृषि  देश के पूरे भाग में की जाती है | चावल मुख्यतः खरीफ की फसल है जिसे जून से अगस्त के बीच में बोया जाता है एवं कटाई नवंबर और दिसंबर के मध्य में की जाती है इसकी कृषि समुद्र तल से 200 मीटर की ऊंचाई तक पूर्वी भारत के  आर्द्र भागो से लेकर उत्तर पश्चिमी भारत के शुष्क लेकिन सिंचित क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जाती है | दक्षिणी राज्य तथा पश्चिम बंगाल में जलवायु अनुकूलता के कारण एक कृषि वर्ष में चावल की दो या तीन फसलें उगाई जाती है | जिसे पश्चिम बंगाल में  ऑस , अमन तथा बोरो  कहा जाता है इसके लिए तापमान 23 से 29 डिग्री सेंटीग्रेड होनी चाहिए |

                चावल की उपज के लिए  दशाएँ

                                 तापमान 

 चावल की कृषि के लिए कम से कम 20 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान होनी चाहिए इसे बोते समय की  21 डिग्री सेंटीग्रेड, बढ़ते समय 24 डिग्री सेंटीग्रेड तथा पकते समय 27 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान की  आवश्यकता होती है |

                               वर्षा

 चावल जल में अंकुरित होने वाला पौधा है इसे बोते समय खेत में लगभग 20 से 30 सेंटीमीटर गहरा जल भरा होना चाहिए चावल की फसल के लिए 125 से 200 सेमी  वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है बुवाई के समय  वर्षा अधिक होनी चाहिए जैसे-जैसे पकने का समय आता है वैसे वैसे कम वर्षा की आवश्यकता रहती है |

                                 मिट्टी

 चावल की खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी होना चाहिए इसके लिए   चीकायुक्त दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है | नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी में चावल का पौधा भलीभांति उगता  है | चावल की खेती के लिए हल्के ढाल वाले मैदानी भाग अनुकूल होती है |

                          क्षेत्र एवं उत्पादन

 भारत में पंजाब राज्य चावल उत्पादकता में शीर्ष स्थान पर है यद्यपि सभी राज्यों में चावल की कृषि की जाती है किंतु इसका अधिकांश कृषि क्षेत्र केवल 8 राज्यों मे  पश्चिम बंगाल , उत्तर प्रदेश , आंध्र प्रदेश पंजाब ,  उड़ीसा , बिहार, छत्तीसगढ़ तथा तमिलनाडु में पाया जाता है उत्पादन के क्रम में पश्चिम बंगाल उत्तर प्रदेश तथा पंजाब क्रमश पहले दूसरे तथा तीसरे स्थान पर है |

                                गेहूं

 चावल के बाद गेहूं देश का दूसरा महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है इसके अंतर्गत वर्ष 2015-16 में कुल खाद्यान्नों के क्षेत्रफल का लगभग 25% भाग और उत्पादन का लगभग 36% भाग पाया जाता है विश्व की गेहूं उत्पादक देशों में भारत का दूसरा स्थान है वर्ष 1967- 68 के बाद गेहूं की कृषि की उल्लेखनीय प्रगति हुई है जिसके कारण ही देश खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर हो सकता है भारत में गेहूं रबी की फसल के रूप में उगाया जाता है |

                          उपज की दशाएं

                             तापमान

 गेहूं की खेती के लिए उगते समय 10 डिग्री सेंटीग्रेड तथा पकते समय 15 से 20 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान की  आवश्यकता होती है |

                                 वर्षा

 गेहूं की खेती के लिए 75 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है 100 सेंटीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूं की कृषि नहीं की जाती है  सिंचाई की सहायता से गेहूं 20 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता है | वर्षा की मात्रा उगते  समय अधिक होनी चाहिए  |जैसे जैसे गेहूं का पौधा बढ़ता जाता है वैसे वैसे  वर्षा की आवश्यकता कम होती जाती है तथा पकत्ते समय  वर्षा गेहूं के लिए हानिकारक होती है |

                               मिट्टी

 गेहूं की कृषि अनेक प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है परंतु हल्की मृतिका मिट्टी ,  मृतिकायूक्त दोमट मिट्टी , भारी दोमट मिट्टी , बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए उत्तम होती है गेहूं की कृषि में बड़े पैमाने पर यंत्रों का प्रयोग किया जाता है| इसलिए इसे  समतल मैदानी भागों  आवश्यकता  होती है |

                          क्षेत्र एवं उत्पादन

 गेहूं की खेती देश के सकल कृषि क्षेत्र के लगभग 15% भाग पर की जाती है गेहूं का देश के कुल अनाज और  खाद्यान्न में क्रमशः 36.37% और 34.4% का योगदान रहा है | भारत के अधिकांश गेहूं का उत्पादन केवल छ: राज्य  क्रमश: उत्तर प्रदेश प्रदेश,  पंजाब , मध्य प्रदेश , हरियाणा , राजस्थान तथा बिहार  से प्राप्त होता है | गेहूं के अंतर्गत कृषि क्षेत्र का 52.9% भाग सिंचाई युक्त है विश्व में गेहूं का सर्वाधिक उत्पादन चीन में तथा दूसरे स्थान पर भारत में होता है |भारत में उत्तर प्रदेश का गेहूं उत्पादन में प्रथम स्थान है यहां देश के कुल उत्पादन का 29% गेहूं पैदा होती है |

                            ज्वार

      ज्वार  अफ्रीकी मूल का पौधा है  उत्तरी भारत में ये चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है | परंतु प्रायद्वीपीय भारत मे यह महत्वपूर्ण खाद्य फसल है जवाहर खरीफ तथा रबी दोनों प्रकार की फसल है | खरीफ की फसल के रूप में यह 26 से 35 सेंटीग्रेड तापमान वाले इलाकों पैदा की जाती है | रबी की फसल को 16 सेंटीग्रेड से अधिक तापमान वाले इलाकों में बोया जाता है उगते समय इसे 30 सेंटीमीटर वर्षा की आवश्यकता होती है और 100 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा वाले इलाकों में इसकी खेती संभव नहीं है | यह दोमट तथा बलूइयुक्त  मिट्टी सहित कई प्रकार की मिट्टियों में उग सकती हैं | लेकिन चीकायुक्त , गहरी रेगुर मिट्टी इसके लिए आदर्श होती है ज्वार मुख्यता प्रायद्वीपीय भारत की फसल है महाराष्ट्र ज्वार उत्पादन में प्रथम स्थान पर है इसके बाद क्रमशः कर्नाटक , तमिलनाडु , मध्यप्रदेश एवं आंध्र प्रदेश  इसके प्रमुख उत्पादक राज्य है |

                               बाजरा 

 बाजरा भी अफ्रीकी मूल का पौधा है सामान्यता शुष्क प्रदेशों की फसल या महत्वपूर्ण मोटा अनाज है जिसे भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है इससे पशुओं के चारे तथा छप्पर बनाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है | यह एक शष्क जलवायु वाली फसल है जो 40 से 50 सेमी  वार्षिक वर्षा वाले इलाकों में बोई जाती है |  इसके लिए आदर्श तापमान 25 डिग्री से 30 डिग्री सेंटीग्रेड होता है |

 इसकी वृद्धि के लिए प्रारंभिक चरणों में हल्की वर्षा के बाद  तेज धुप बड़ी लाभकारी होता है | या खरीफ की फसल है जिसे मई से सितंबर तक बोया जाता है | और अक्टूबर से फरवरी मार्च तक काट लिया जाता है या  वर्षा पर आधारित फसल है | जिसे सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है |

                                मक्का

 मक्का मुख्यतः खरीफ की फसल है परंतु कुछ क्षेत्रों में से रबी के रूप में भी उगाया जाता है | यह मोटा अनाज है जिसे मनुष्य के लिए भोजन तथा पशुओं के लिए चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है | इससे स्टार्च  तथा ग्लुकोज प्राप्त किया जाता है  | यह फसल भारतीय मूल की नहीं है  बल्कि इसे 17 वी शताब्दी के आरंभ में अमेरिका से लाया गया था यह भारत की उत्तरी मैदान तथा उप हिमालयी क्षेत्र की महत्वपूर्ण फसल बन गई है  यह फसल विभिन्न प्रकार की भौगोलिक परिस्थितियों में उग सकता है |

 यह फसल मुख्य रूप से वर्षा आधारित फसल है | वर्षा ऋतु के आरंभ होने के कुछ समय पहले बोई जाती है | तमिलनाडु में यह रबी की फसल है | जहां पर इसे शीतकालीन वर्षा ऋतु आरंभ होने से पहले सितंबर अक्टूबर में बोया जाता है इसे 50 से 100  सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है | और इसे फसल को 100 से  अधिक वार्षिक वर्षा वाले इलाकों में नहीं  बोया जाता है वर्षा के बाद चमकीले धूप इसके लिए बहुत उपयोगी होती है |

 मक्का की खेती के लिए नाइट्रोजन युक्त दोमट या लाल मिट्टी आदर्श होती है पहाड़ी इलाकों में यह खुरदरी मिट्टी में भी उग जाती है |

 मक्का की खेती पूरे भारत में की जाती है आंध्र प्रदेश का उत्पादन एवं कर्नाटक का क्षेत्र इस दृष्टि से प्रथम स्थान पर है |

                              जौ 

 जौ की खेती पहले विस्तृत क्षेत्रफल पर की जाती थी लेकिन अब इसे सीमित क्षेत्र में ही बोया जाता है यह मोटा अनाज है जिसे भोजन तथा बियर  एवं व्हिस्की बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है | इसका पौधा उच्च तापमान तथा उच्च  आर्द्रता को सहन नहीं करता इसके लिए लगभग 3 माह तक 10 से 15 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान रहना चाहिए और वर्षा 75 से 100 सेमी से अधिक नहीं होनी चाहिए हल्की चिका एवं कॉप मिट्टी इसके लिए उपयुक्त होती है | इसे भारत के उत्तरी मैदान तथा पश्चिमी हिमालय की घाटियों में रबी की फसल के रूप में बोया जाता है भारत में जौ की कृषि का प्रचलन बहुत कम होते जा रहा है |

                       दलहनी फसलें

 भारत विश्व में दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक है दालों के अंतर्गत चना , अरहर , तुर , उड़द , मूंग , मसूर , मटर , लोबिया , मोठ आदि कई  खाद्यान्न फसल है दलहन में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है इसमें से कुछ को पशुओं के चारे के रूप में भी प्रयोग किया जाता है यह मिट्टी को  वायुमंडलीय नाइट्रोजन प्रदान करती है जिससे  मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है |

 दालों के उत्पादन में मध्यप्रदेश का प्रथम स्थान है जिसके बाद महाराष्ट्र स्थान आता है |

     कुछ दलहनी फसलें निम्नलिखित है 

                              चना 

  चना दलहन की एक प्रमुख फसल है जिसका दलहन की फसलों के सकल क्षेत्र में 40.4% और उत्पादन में का  51.2 योगदान  है चना में 61.5% कार्बोहाइड्रेट 21% प्रोटीन होता है |

 चना को विभिन्न प्रकार की  मिट्टी में उगाया जाता है परंतु सूप्रवाहित दोमट मिट्टी  सबसे उपयुक्त मानी जाती है | चना की बुवाई मध्य अक्टूबर-नवंबर में और कटाई मार्च-अप्रैल में की जाती है |

 चना की खेती देश के विभिन्न भागों में की जाती है लेकिन विशेषकर मध्य प्रदेश महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश राज्य में ज्यादा देखा जाता है |

                      अरहर

 दालों में अरहर का दूसरा स्थान है इसे गन्ना और कपास के खेतों में चारों और बाड़ की तरह लगाया जाता है | यह वर्ष भर की फसल है जिस की बुवाई मई जुलाई एवं कटाई जनवरी अप्रैल में की जाती है इसे ज्यादातर मिश्रित फसल के रूप में हो उगाया जाता है | अरहर का सर्वाधिक उत्पादन मध्यप्रदेश राज्य में होता है  | जबकि महाराष्ट्र , कर्नाटक अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य है |

                              लोबिया

 लोबिया एक दलहनी फसल है जिसका प्रयोग सब्जी के साथ साथ जानवरों के चारे में प्रयोग किया जाता है | लोबिया शीतोष्ण और समशीतोष्ण जलवायु में उगाया जाता है इसकी खेती खरीफ के रूप में वर्षा ऋतु में की जाती है | इसका उत्पादन मुख्य रूप से कर्नाटक , तमिलनाडु , मध्य प्रदेश , केरल तथा उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में किया जाता है |

                                मूँग

 मूंग एक दलहनी फसल है जिसका प्रयोग खाद्यान्न के रूप में किया जाता है | इसमें प्रोटीन की अधिक मात्रा  पाई जाती है | मूंग की खेती खरीफ एवं जायद दोनों मौसम मे की जा सकती है लेकिन जायद में मूंग की खेती के लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है | राजस्थान मूंग का सर्वाधिक उत्पादक राज्य है | आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु इसके अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य है |

                       तिलहन फसलें

  जिस फसल से हमें तेल प्राप्त होता है उसे तिलहन फसल कहा जाता है |  तील , सरसों , अलसी , मूंगफली , नारियल , अरंडी ,  सोयाबीन , सूरजमुखी  आदि तिलहन फसल है |

 तिलहन बहुत ही लाभकारी फसलों का समूह है इससे हमें निम्नलिखित लाभ प्राप्त होता है |

 तिलहन फसल से हमें विभिन्न प्रकार के तेल प्राप्त होता है | जिसका प्रयोग खाना बनाने , दवाइयों बनाने तथा विभिन्न उद्योगों जैसे साबुन , मशीन का तेल ,  रोगन , मोमबत्ती  आदि में किया जाता है |

 तिलहन में से जो तेल निकाल लेने के बाद जो खली बच जाती है उसे पशुओं के लिए पौष्टिक आहार बनाया जाता है |

 बहुत से तिलहन फसलों को बोने से भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ जाती है |

  तिलहन के उत्पादन से किसानों को अधिक धन प्राप्त होती है |

 देश में तिलहन उत्पादन में गुजरात का स्थान सर्वोपरि है | राजस्थान , मध्य प्रदेश ,  महाराष्ट्र ,आंध्र प्रदेश आदि  अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य हैै |

                             मूंगफली

 मूंगफली ब्राजील का मूल पौधा है| पिछले लगभग आधी शताब्दी से भारत में  इसकी कृषि का का प्रचलन बहुत बढ़ गया है | आज यह भारत का सबसे महत्वपूर्ण तिलहन फसल है | और भारत के कुल तिलहन उत्पादन में मूंगफली का 15.15% योगदान है  | मूंगफली में विटामिन तथा  प्रोटीन प्रचुर मात्रा में होती है इससे बनस्पति घी बनाया जाता है और विभिन्न उद्योगों में प्रयोग किया जाता है |

 यह उष्ण कटिबंधीय जलवायु का पौधा है जिसके लिए 20 डिग्री से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान तथा 50 से  75 सेमी वार्षिक वर्षा की आवश्यकता पड़ती है | यह अधिक आद्र जलवायु में नहीं पनपता है | पाला , लंबा सूखा तथा लंबी अवधि की वर्षा इसके लिए हानिकारक होती है  इसके लिए बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है |

 भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मूंगफली का उत्पादक देश है | भारत में गुजरात मूंगफली का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है | इसके अलावा राजस्थान , आंध्र प्रदेश , तमिलनाडु , कर्नाटक , महाराष्ट्र में भी मूंगफली का उत्पादन होता है |

                       तोरिया एवं सरसों

 मूंगफली के बाद तोरिया और सरसों भारत के दूसरे महत्वपूर्ण तिलहन फसल है इसमें तेल की मात्रा 25 से 45% तक होती है इसे खाना बनाने , अचार डालने तथा बालों में लगाने के लिए प्रयोग किया जाता है राजस्थान भारत में तोरिया और सरसों का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है |जो भारत के कुल उत्पादन का 48.10% उत्पादन करता है इसके अलावा उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , हरियाणा और गुजरात में भी इसका उत्पादन होता है |

                            अलसी

 अलसी भी एक महत्वपूर्ण तिलहन फसल है जिसमें 35 से 47% तक तेल होता है इसका प्रयोग पेंट ,  वार्निश , छपाई की स्याही तथा जल विरोधी वस्त्र के लिए किया जाता है | इसकी खेती विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में की जा सकती है | फिर भी इसके लिए 20 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान तथा 75 सेमी वर्षा वाली ठंडी तथा आद्रता जलवायु अधिक उपयोगी होती है |

 चीकायुक्त  दोमट  गहरी काली और  काँप की मिट्टी मे भलीभांति उगती  है  यह रबी की फसल है जिसे अक्टूबर-नवंबर में बोया जाता है और मार्च-अप्रैल में काट लिया जाता है | 

                          तिल

 तिल भी एक प्रकार का तिलहन फसल है | जिसमें 45 से 50% तेल होता है | जिसका प्रयोग खाना बनाने तथा दवाइयों के लिए किया जाता है | तिल वर्षा पर आधारित फसल है जिसे सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती है | यह मुख्यता समतल भूमि की फसल है यह उत्तरी भारत में खरीफ तथा दक्षिणी भारत में रबी की फसल है |

                         सोयाबीन

 सोयाबीन में 40 से 50% प्रोटीन तथा 20 से 22% तक तेल की मात्रा पाई जाती है | यह खरीफ मौसम में बोई जाती है | इसके लिए 13 डिग्री सेंटीग्रेड से 24 डिग्री सेंटीग्रेड का तापमान तथा 40 सेमी से 60 सेमी की वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है | मध्य प्रदेश सोयाबीन के उत्पादन में अग्रणी है | इसलिए इसे सोया प्रदेश कहा जाता है |  इसके अलावा महाराष्ट्र एवं राजस्थान में भी इसकी खेती की जाती है |

       नकदी फसलो के  बारे में बताएं 

 नकदी फसलों के अंतर्गत उन व्यापारिक फसलों को सम्मिलित करते हैं जिन्हें आमदनी के लिए सीधे या  अर्ध्द प्रसंस्कृत रूप से किसानों द्वारा बेचा जाता है  इसमें गन्ना ,तंबाकू , रेशेदार फसलें ,कपास ,जुट  प्रमुख फसल है |

 इन फसलों से उद्योगों को कच्चा माल प्राप्त होता है तथा किसानों को अपना जीवन स्तर सुधारने के साथ ही साथ कृषि विकास के लिए पूंजी की प्राप्ति होती है |

        कुछ प्रमुख नकदी फसल  निम्नलिखित है

                                   गन्ना

 भारत गन्ने की जन्मभूमि है गन्ना बाँस प्रजाति का पौधा है | गन्ना भारत की प्रमुख नकदी फसल है गन्ना से चीनी उद्योग को कच्चे माल की प्राप्ति होती है | चीनी , गुड़ , खाण्डसारी के अलावा इससे प्राप्त शीरे का उपयोग शराब निर्माण एवं खोई  का इस्तेमाल कागज उद्योग में किया जाता है | गन्ना उत्पादन में विश्व में भारत का दूसरा स्थान पहले  स्थान पर ब्राज़ील आता है |

 गन्ना उत्पादन के लिए 100 से 150 सेमी वर्षा वाले इलाकों में गन्ना भलीभांति फलता फूलता है | कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता होती है कटाई से पहले शुष्क वातावरण हो तो गन्ने में मिठास अधिक हो जाती है |

 गन्ना 11 से 12 महीने में पकता है | इस लंबे वर्धन काल में 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान का होना आवश्यक है | गन्ने को बोते समय सामान्य तापमान बढ़ते समय अधिक तापमान तथा पकते समय कम तापमान की आवश्यकता होती है  | पाला गन्ने के लिए हानिकारक होता है |

 गन्ने की खेती के लिए गहरी दोमट मिट्टी जिसमें जल का बहाव भलीभांति होता हो  उत्तम होती है चुनायुक्त मिट्टी  गन्ने की वृद्धि में सहायता देती है | अतः नदी घाटियों , बाढ़ के मैदानों तथा डेल्टाई प्रदेशों की मिट्टी  गन्ने की कृषि के लिए बहुत उपयुक्त होती है | गन्ना मिट्टी की उर्वरा शक्ति को जल्दी ही समाप्त कर देता है | अतः इसकी  कृषि में बड़ी मात्रा में खाद एवं उर्वरकों की आवश्यकता होती है |

 गन्ने के लिए मैदानी भाग उपयुक्त होती है क्योंकि यहां पर  इसकी  कृषि के विकास के लिए अनेक सुविधाएं प्राप्त होती है |  क्योंकि मैदानों में गन्ने की कृषि के लिए बुलडोजर , कल्टीवेटर , हार्वेस्टर आदि यंत्रों का प्रयोग हो सकता है | गन्ने को चीनी मिलो तक पहुंचाने के लिए यातायात के साधन भी मैदानों में ही जुटाए जा सकते हैं |

 गन्ने का सर्वाधिक विस्तार उत्तरी भारत के मैदानी भाग में पाया जाता है | इसकी खेती उत्तर प्रदेश , बिहार , पंजाब , हरियाणा , महाराष्ट्र  तामिलनाडु , कर्नाटक , आंध्र प्रदेश , गुजरात  आदि राज्यों में की जाती है गन्ने के उत्पादन में प्रथम स्थान उत्तर प्रदेश का है जबकि महाराष्ट्र ,  तमिलनाडु क्रमश: दूसरे व तीसरे स्थान पर है |

                        कपास

 कपास एक विश्वव्यापी पौधा है विश्व में आधे से अधिक कपड़े कपास के रेशे से तैयार किया जाता है | कपास के बिनौले से तेल तथा घी बनाया जाता है | बिनौला तथा इसकी खली जानवरों को खिलाई जाती है | खली का खाद के रूप में भी प्रयोग किया जाता है | कपास के सूखे पौधे का प्रयोग इंधन के रूप में किया जाता है |

 व्यापारिक दृष्टि से कपास  का  वर्गीकरण लंबाई के अनुसार किया जाता है |

                   लंबे रेशे वाली कपास

 लंबे रेशे वाली  कपास सबसे बढ़िया किस्म की कपास होती है | जिसके लिए से की लंबाई 60 मिली मीटर होती है | इसका  रेशा लंबा , चमकीला , हल्का , मजबूत तथा मुलायम होता है इससे उच्च कोटि के वस्त्र बनाए जाते हैं यह कपास मिश्र , संयुक्त राज्य अमेरिका तथा पश्चिमी द्वीप समूह में पैदा की जाती है | भारत में भी इसकी कृषि होने लगी है |

                मध्यम  रेशे वाली कपास

 मध्यम रेशे वाली कपास की लंबाई सामान्यता 25 से मिमी से 40 मिमी तक लंबा होता है | यह  रेशा सुदृढ़ भी होता है संयुक्त राज्य अमेरिका इस कपास का सबसे बड़ा उत्पादक है | भारत में भी यह कपास उत्पन्न की जाती है | व्यापारिक दृष्टि से यह सबसे महत्वपूर्ण कपास है |

                       छोटे रेशे वाली कपास

  छोटे रेशे वाली कपास का रेशा 25 मिमी से कम लंबा होता है | यह कपास भारत , चीन तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया के अन्य देशों और ब्राजील में भी पैदा होती है | भारत में कपास के कुल क्षेत्र का 17% छोटे रेशेवाली 44% मध्यम रेशेवाली तथा 39%  लंबे रेशे वाली कपास के अंतर्गत आता है |

 कपास उपोष्ण तथा उष्णकटिबंधीय पौधा है | इसलिए इसे ऊंचे तापमान की आवश्यकता होती है | इसके लिए  21 से 25 सेंटीग्रेड तापमान अनुकूल होता है पाला इस पौधे का प्रथम शत्रु है इसके लिए वर्ष  मैं  200 पाला रहित दिन होने अनिवार्य है| तेज चमकीली धूप कपास के पौधों को बढ़ने में सहायता देती है |

 कपास की खेती के लिए 50 से 100 सेमी वर्षा पर्याप्त होती है | वर्षा  थोड़े दिनों के अंतराल पर होते रहना चाहिए  पकते समय शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है | सिंचित भूमि पर पैदा होने वाली कपास उत्तम होती है |

 अच्छे अपवाह वाली हल्की दोमट मिट्टी जो जल को अपने अंदर अधिक देर तक सोख सके कपास की खेती के लिए उत्तम होती है | मिट्टी में चूने के अंश से कपास की खेती में वृद्धि होती है दक्षिणी भारत की लावा से बनी काली मिट्टी सर्वोत्तम होती है | या काले रंग की होती है जिसे रेगुर अथवा कपास की काली मिट्टी कहा जाता है | कपास की खेती से मिट्टी में उर्वरा शक्ति की मात्रा कम हो जाती है इसलिए इसकी  कृषि के लिए  उर्वरक की  अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है |

 भारत विश्व का दूसरा बड़ा कपास उत्पादक देश है | जो विश्व का 16% कपास उत्पादन करता है | देश के लगभग 5% कृषित क्षेत्र पर कपास की खेती की जाती है | जो विश्व में सर्वाधिक  भूमि है कपास के उत्पादन में गुजरात का प्रथम स्थान है | इसके अलावा  महाराष्ट्र , आंध्र प्रदेश एवं पंजाब में भी इसकी खेती की जाती है |

                     पटसन या  जूट

 कपास के बाद जुट भारत की दूसरी महत्वपूर्ण रेशेदार फसल है |जुट का रेशा संस्ता ,मुलायम , मजबूत तथा लंबा होता है | इससे अनेक प्रकार की वस्तुएं बनाई जाती है | जिसमें बोरी, टाट,  रस्सियाँ,  कालीन कपड़े तथा सजावट का सामान आदि प्रमुख है | यह भारतीय मूल का पौधा है | और इससे यहां व्यापारिक फसल के रूप में उगाया जाता है पटसन  खरीफ की फसल है |

 पटसन गर्म तथा आद्र जलवायु में पनपने वाली फसल है | इसके वृद्धि काल में 24 से 35 सेंटीग्रेड तापमान 120-150 सेमी वर्षा तथा 80 से 90%   आपेक्षीक  आर्द्रता की आवश्यकता होती है | इसे बोने तथा इसे रेशे  को धोने के लिए पर्याप्त जल की आवश्यकता होती है |

 हल्की बलुई अथवा चुना युक्त दोमट मिट्टी इसके लिए बहुत अनुकूल होती है | यह मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बहुत जल्दी ही छीन कर देती है अत:  यह उन इलाकों में बोई जाती है | जहां हर वर्ष नदियों द्वारा नई उपजाऊ मिट्टी लाकर  बिछाई जाती है |

 इस फसल को बोने तथा इसने रेशा प्राप्त करने के लिए सस्ते एवं कुशल श्रम की आवश्यकता होती है |

 भारत विश्व में जूट का सबसे बड़ा उत्पादक  देश है | स्वतंत्रता के पूर्व तो इसका जुट एवं जुट  की वस्तुओं  के क्षेत्र में  विश्व में एकाधिकार था  विभाजन के समय 30% जूट उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान अर्थात वर्तमान बांग्लादेश में चले जाने के कारण भारत की जूट मिलों को कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ा हालांकि जूट की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक उपाय किए गए और इसका सकारात्मक फल भी मिला इसकी खेती पश्चिम बंगाल , बिहार , असम , उड़ीसा आदि राज्यों में की जाती है  जट के उत्पादन में पश्चिम बंगाल का प्रमुख स्थान है  और यह कुल उत्पादन का लगभग  75% उत्पादित करता है |

                         तम्बाकू

 तंबाकू भारत में  1508 ईसवी में पुर्तगालियों द्वारा लाया गया था आज भारत ,चीन व ब्राजील के बाद तंबाकू का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है इसकी पत्तियों का उपयोग सिगरेट , बीड़ी बनाने , हुक्का तथा पान में होता है |

 इसके डंठल का उपयोग पोटाश उर्वरक में होता है जिसका चूर्ण कीटनाशक के तौर पर भी प्रयोग किया जाता है |

 भारत में तंबाकू की दो किस्म  पाई जाती है 

        निकोटियाना टीबेकम  तथा निकोटियाना रक्टिका

 तंबाकू उष्ण तथा उप उष्ण जलवायु का पौधा है | तथा 16 डिग्री से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान को सहन कर सकता है | इसे सामान्यतः  100 सेंटीमीटर  वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है |परंतु यदि वर्षा का कालिक वितरण समान हो तो यह  50 सेमी वार्षिक वर्षा मे भी पनप सकता है |  कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता होती है |

 यह ऐसी भुरभुरी बालूकायुक्त दोमट मिट्टी में उगती है | जो इसकी जड़ों के विकास में सहायक हो मिट्टी खनिज लवण से युक्त होना चाहिए ना कि जैविक तत्व से |  यह  निम्न मैदानी भागों से लेकर 1800 मीटर ऊंचे स्थानों पर बोई जाती है |

 खेतों को फसल के लिए तैयार करने प्रतिरोपण , गुड़ाई , निराई , काटने तथा तंबाकू के प्रक्रमण तक सभी क्रियाओं के लिए सस्ते  तथा कुशल श्रम की आवश्यकता होती है |

     बागानी  कृषि किसे कहते हैं इसके बारे में वर्णन करें ......

  बागानी कृषि नई कृषि तकनीकों एवं मशीनों का इस्तेमाल करते हुए  वाणिज्यिक  आधार पर उगाए जाने वाले उष्णकटिबंधीय फसलों की एकल कृषि है  जिसकी शुरुआत औपनिवेशिक काल के दौरान यूरोपीय भूस्वामी द्वारा की गई |

 भारत में इसके अंतर्गत चाय , कहवा , रबड़ एवं मसालों की खेती की जाती है | आज देश में 30,000 से अधिक बागान है जिसमें 200000 से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है |

              कुछ बागानी कृषि निम्नलिखित है 

                      चाय

 चाय देश की सबसे महत्वपूर्ण बागानी फसल है |यह दक्षिणी चीन के युवान पठार का मूल पौधा है | भारत विश्व में चीन के बाद चाय का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है चाय की गुणवत्ता पर मिट्टी की विशेषताओं और ऊंचाई का विशेष असर पड़ता है | सामान्यतया ऊंचाई पर उगाई जाने वाली चाय का स्वाद एवं सुगंध अच्छी होती है | 

         चाय के कृषि के लिए भौगोलिक दशाएं 

                           तापमान

   चाय उष्ण तथा शीतोष्ण कटिबंधीय पौधा है  इसके लिए 25° से 30° सेंटीग्रेड तापमान की आवश्यकता होती है |

                            वर्षा 

 चाय के लिए 200 से 250 सेमी   वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है | चाय की पत्तियों के निरंतर विकास के लिए  वर्षा पूरे साल समान रूप से  वितरित होनी चाहिए | बार बार  बौछार का पडना और सुबह का कोहरा नई पत्तियों की तीव्र वृद्धि में सहायक होती है |

                           मिट्टी

 चाय की खेती के लिए गहरी सूप्रवाहित उर्वर मिट्टी की आवश्यकता होती है मिट्टी में फास्फोरस , पोटाश , लोहान्स  तथा ह्यूमस  पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए ताकि चाय की झाड़ी तेजी से बढ़ सके चाय की कृषि के लिए अधिक वर्षा की आवश्यकता होती है | तो भी पानी चाय की झाड़ी की जड़ों में खड़ा नहीं रहना चाहिए नहीं तो पानी जमा रहने से इसकी जड़ों को गला देती है | और झाड़ी नष्ट हो जाती है इसलिए चाय की खेती पर्वतीय ढलानो पर की जाती है |

                            श्रम

 चाय निराई गुड़ाई तथा काट छांट आदि कामों के लिए पर्याप्त मात्रा में श्रमिक की आवश्यकता होती है | चाय की पत्ती को  झाड़ी से तोड़ने के लिए कुशल तथा संस्ता  श्रमिक चाहिए यह काम मशीनों से नहीं हो सकता  इसलिए इसमें औरत तथा बच्चे अपने हाथों से यह काम करते हैं |

                        क्षेत्र एवं उत्पादन

  भारत में चाय का उत्पादन देश में कुल उत्पादन का लगभग 75% भाग केवल असम और पश्चिम बंगाल द्वारा प्रदान किया जाता है |  चाय उत्पादन का दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र नीलगिरी पहाड़ियों के सहारे स्थित है | जिसमें तमिलनाडु , केरल एवं कर्नाटक के भाग समाहित है |

 असम राज्य देश में चाय का सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य है | यहां चाय उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र है  | ब्रह्मपुत्र घाटी तथा  सुरमा घाटी  ब्रह्मपुत्र घाटी देश का सबसे बड़ा चाय उत्पादक क्षेत्र है | तथा पश्चिम बंगाल देश का दूसरा प्रमुख चाय उत्पादक राज्य है | यहां चाय का बागान  दूआर एवं दार्जिलिंग पहाड़ियों में पाए जाते हैं |  देश में तमिलनाडु का चाय उत्पादन में तीसरा स्थान है | चाय भारत के निर्यात की प्रमुख वस्तु है वर्ष 1965 से पूर्व भारत विश्व में चाय का सबसे प्रमुख निर्यातक देश था | परंतु आज  श्रीलंका एवं चीन के बाद उसका   तीसरा स्थान है |

                             कहवा

 कहवा का पौधा अबीसीनिया  मूल का पौधा है | देश में इसकी खेती अंग्रेजों द्वारा प्रारंभ की गई दक्षिण भारत के कर्नाटक , केरल और तमिलनाडु राज्यों में यह एक लोकप्रिय पेय पदार्थ है | कहवा कि पौधों के लिए उष्ण  एवं  आर्द्र जलवायु अच्छी मानी जाती है |

 खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार वर्ष 2016 में विश्व में कहवा उत्पादन में भारत का स्थान छठवां है | भारत में  0.4 मिलियन  हेक्टेयर  क्षेत्र में कॉफी उगाई जाती है | भारत में कॉफी के उत्पादन का अधिकांश भाग निर्यात कर दिया जाता है | कहवा का 85% क्षेत्र और लगभग 98% उत्पादन केवल कर्नाटक , केरल और तमिलनाडु राज्य द्वारा प्रदान किया जाता है | कहवा के उत्पादन में कर्नाटक देश का प्रथम राज्य है | जिसमें कहवा का दूसरा प्रमुख उत्पादक राज्य केरल है | तथा तमिलनाडु कहवा उत्पादन में तीसरे स्थान पर है  |

                              रबड़

 रबड़ ब्राजील मूल का पौधा है रबड़ के पौधों के लिए गर्म और नम जलवायु अच्छी होती है रबड़ के पौधों को पहले नर्सरी में उगाते हैं | एवं  0.4 से 0.6 मीटर की लंबाई प्राप्त करने पर इन्हें बागान में रोपित कर दिया जाता है | इसका उत्पादन केरल , तमिलनाडु , कर्नाटक , त्रिपुरा एवं असम  आदि राज्यों में होता है  रबड़ के उत्पादन में केरल का प्रथम स्थान है |

            फल उत्पादन और फूलों की कृषि

 आज भारत में विभिन्न प्रकार के मौसमों में विभिन्न प्रकार के फल फूल एवं सब्जियों का उत्पादन किया जाता है | इसको ट्रक फार्मिंग या हॉर्टिकल्चर के नाम से भी जाना जाता है | इसके उत्पादन में सामयिक  एवं स्थानीय स्तर पर व्यापक अंतर दिखाई देता है | भारत में जहां फलों में आम , सेब , संतरा , अंगूर , केला , नाशपाती आदि की खेती की जाती है | वही फूलों में लिली , टयूलिप , गुलाब , मेरीगोल्ड आदि का स्थान आता है | जबकि सब्जियों में गोभी , आलू , बैंगन , लौकी , भिंडी गाजर , परवल की प्रमुखता है | भारत विश्व में फलो , फूलों एवं सब्जियों   का चीन के बाद दूसरा सर्वाधिक उत्पादन करने वाला देश है  |

       भारतीय कृषि को प्रभावित करने वाले कारकों को लिखें ....

 भारतीय कृषि को प्रभावित एवं निर्धारित करने में प्राकृतिक , सामाजिक , ऐतिहासिक , आर्थिक एवं प्रशासनिक कारक  महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है | भारतीय कृषि को भौतिक एवं आर्थिक कारक भी कृषि को प्रभावित करती है हरित क्रांति के बाद कृषि को प्रभावित करने वाले कारकों में भूमि सुधार , सिंचाई , उर्वरक ,  बैंकिंग  विपणन आदि की भूमिका प्रमुख हो गई है | इन सभी कारकों को दो भागों में विभक्त किया किया गया है  |     

                  (1) संरचनात्मक कारक

 कृषि के विकास क्षेत्र विशेष की भौतिक दशा अधोसंरचनात्मक सुविधा तथा संस्थागत कारकों पर निर्भर करता है | परंतु इन कारकों में कृषि के गुणात्मक एवं मात्रात्मक विकास में सर्वाधिक प्रभावशाली संरचनात्मक कारक ही  है | संरचनात्मक कारक मूलतः  विज्ञान व तकनीक पर आधारित है | इन कारकों के अंतर्गत सिंचाई , उर्वरक , बीज ,  वाणिज्यिक उर्जा , कीटनाशक , मशीनीकरण प्रमुख कारक है |

                       सिंचाई

 भारतीय परिप्रेक्ष्य में अनिश्चित मानसूनी वर्षा की स्थानिक व कलिक      भिन्नता , वर्षा का तीव्र विचलन , वर्षा की अनियमितता, मानसून विभांगता , वर्षा ऋतु की सीमित अवधि , वर्षा का मूसलधार  स्वरूप आदि कुछ ऐसे कारक है | जिसके कारण सिंचाई की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है | इसके अलावा अलग-अलग फसलों के लिए अलग-अलग समय एवं अलग-अलग जल की मात्रा की आवश्यकता होती है | इसके लिए  सिंचाई  महत्वपूर्ण हो जाती है |

 अतः  प्रति हेक्टेयर उच्च उत्पादकता और उच्च  कृषि लाभ के लिए सिंचाई की सुविधाओं का होना आवश्यक है | नियोजन काल के दौरान विशेषता तीसरी पंचवर्षीय योजना के उपरांत हरित क्रांति के   समय  में सिंचाई के विकास को काफी ध्यान दिया गया | आधुनिक समय में सिंचाई का विकास विभिन्न प्रकार के तकनीकी आधार पर वर्गीकृत करने का कार्य किया गया है | जिससे सिंचाई का लक्षित उपयोग हो सके साथ ही साथ जल की हानि भी कम है |

                      सिंचाई के साधन 

 सतही व भौम  जल की उपलब्धता , उच्चावच संरचना ,  मृदा जलवायु दशा में भिन्नता के कारण देश में सिंचाई के कई साधन विकसित हुए हैं  इसमें तालाब , कुएं व नहर सम्मिलित है |

 इन सभी सिंचाई साधनों के अपने अपने फायदे एवं नुकसान है गंगा के विशाल मैदान की मंद ढाल और कोमल  मिट्टी जहां उस स्थान पर नहरों के विकास को प्रोत्साहित करती है | वही वह  नहरो  में जमे गाद से बाढ़  वहीं आमंत्रण देती है| इसके अलावा जलजमाव की समस्या से भूमिका लवनिकरण भी हो जाता है |

 पूरे भारत में  शुद्ध सिंचित क्षेत्र का लगभग 59% कुओं द्वारा , लगभग 25% नहरों द्वारा एवं लगभग 3.5% तालाबो द्वारा सिंचाई होता है | बाकी अन्य साधनों से सिंचाई होता है | उत्तरी भारत के जलोढ़ क्षेत्र में नलकूप , कुआँ , व नहर सिंचाई के प्रमुख साधन है  दक्कन के पठार की रावेदार शिलाओ के क्षेत्र में तालाबों की प्रधानता है | नलकूपों द्वारा सिंचित भूमि का सर्वाधिक इसका उत्तर प्रदेश में पाया जाता है | उसके बाद राजस्थान व मध्यप्रदेश  का स्थान आता है | हाल के वर्षों में लघु सिंचाई के अंतर्गत  ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई का विकास हुआ है |

                          ड्रिप सिंचाई - 

 ड्रिप सिंचाई को टपक सिंचाई भी कहा जाता है | इसमें पौधों की जड़ों में बूंद-बूंद जल जल पहुंचाया जाता है जिससे जल की हानि बहुत कम होती है | एवं उसका अधिकतम उपयोग होता है | आधुनिक कृषि में इसका व्यापक प्रचलन बढ़ गया है |

                     ड्रिप सिंचाई के लाभ

 ड्रिप सिंचाई के द्वारा नियमित पानी मिलने से उत्पादन में वृद्धि होती है |

 इससे पानी की बचत होती है |

 मृदा लवणता में कमी आती है |

 अनावश्यक बहाव ना होने के कारण मृदा अपरदन में भी कमी आती है |

 पानी में ही उर्वरक मिला देने से उर्वरक  सीधे जड़ तक पहुंचते हैं जिससे उर्वरक की बचत होती है |

 सिंचाई का पानी सीधे जड़ों तक  पहुंचने  के कारण आसपास की जमीन सुखी  रहती है जिसे खरपतवार में कमी आती है |

                       स्प्रिंकलर सिंचाई 

 स्प्रिंकलर सिंचाई में जल को विभिन्न पाइप आदि के माध्यम से उच्च दबाव पर छोड़ा जाता है | जिससे यह  लक्षित क्षेत्र या  खेतों में ऊपर से पौधों को पानी उपलब्ध कराता है | ये स्थाई तौर पर लगाया जाता है इसका उपयोग गार्डन एवं सब्जी उत्पादन में काफी बढ़ा  है | इसको फव्वारा सिंचाई की कहा जाता है |

          बहुउद्देशीय परियोजनाएं

  बहुउद्देशीय परियोजनााओं  के द्वारा सिंचाई ,जल विद्युत उत्पादन , बाढ़ नियंत्रण , वृक्षहरापन , जलापूर्ति , मृदा संरक्षण , नौकायान ,  मत्स्य पालन , पर्यटन , वन जीवन संरक्षण का उद्देश   रखा गया था

 भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएं निम्नलिखित है

                    दामोदर  घाटी परियोजना

 दामोदर घाटी परियोजना की रूपरेखा संयुक्त राज्य अमेरिका की टेनेसी वैली अथॉरिटी के आधार पर तैयार की गई थी | दामोदर हुगली की सहायक नदी है इस परियोजना से झारखंड एवं पश्चिम बंगाल को लाभ हो रहा है | इस परियोजना  अंतर्गत सिंचाई सुविधा के साथ-साथ ताप विद्युत गृह एवं गैस आधारित टरबाइन  स्टेशन लगाए गए हैं |

                भाखड़ा नांगल परियोजना

 भाखड़ा नांगल परियोजना पंजाब , हरियाणा ,राजस्थान राज्य का संयुक्त उपक्रम है | इसके अंतर्गत बांध भाखड़ा नहर तंत्र पर विद्युत गृह  शामिल है | भाखड़ा नांगल परियोजना सतलुज नदी पर स्थित है | यह  विश्व का सबसे बड़ा सीधा गुरुत्व बांध है जिसकी लंबाई 518 मीटर तथा ऊंचाई 226 मीटर है जिसके द्वारा गोविंद सागर झील बनाई गई है |

                     कोसी परियोजना

 कोसी नदी में आने वाली विनाशकारी बाढ़ की रोकथाम के उद्देश्य से इस परियोजना के लिए भारत और नेपाल के बीच वर्ष 1954 में समझौता हुआ था | हाल ही में भारत और नेपाल के बीच संयुक्त रुप से सप्तकोशी बहुउद्देशीय परियोजना है  | और सुनकोशि संचयन के साथ विपथन  कार्यक्रम  को विकसित करने में सहमति दिखाई | इसमें जलविद्युत , सिंचाई , बाढ़ नियंत्रण और प्रबंधन तथा नौ परिवहन विकसित करने में सहायता मिलेगी इससे सप्तकोशी बांध 3000 मेगावाट बिजली का उत्पादन करेगा |

 इस बांध पर बने बैराज से दो नहरें निकालने पर विचार किया जा रहा है | पूर्वी कोसी नहर तथा पश्चिमी कोसी नहर कोसी  नहर प्रणाली द्वारा भारत और नेपाल के बड़े क्षेत्र को  सिंचित किया जाएगा | पूर्वी कोसी नहर और हनुमान बैराज के मध्य विद्युत उत्पादन हेतु तीन  नहर विद्युत गृह  के निर्माण पर विचार किया गया है | प्रत्येक विद्युत गृह  की स्थापित क्षमता 100 मेगावाट है |

                 रिहन्द बांध परियोजना 

 रिहंद बांध परियोजना उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय परियोजना है | इसके अंतर्गत सोन की सहायक रिहंद नदी पर एक बांध सोनभद्र जनपद में बनाया गया है | और इसके द्वारा रोके गए जल को गोविंद बल्लभ पंत सागर जलाशय में संग्रहित किया गया है | इसके द्वारा निकाली गई नहर से बिहार में भी सिंचाई होती है |

                       चम्बल  परियोजना

 यमुना नदी की सहायक नदी चम्बल नदी पर यह परियोजना राजस्थान और मध्य प्रदेश राज्यों का संयुक्त उपक्रम है | इसके अंतर्गत राना प्रताप सागर जलाशय का निर्माण किया गया है |

                हीराकुंड बांध परियोजना 

 यह उड़ीसा राज्य में महा नदी पर निर्मित परियोजना है हीराकुंड बांध विश्व के सबसे लंबे बांधों में से एक है जिसकी लंबाई 4801 मीटर तथा ऊंचाई 61 मीटर है |

                     तुंगभद्रा परियोजना 

 यह परियोजना कृष्णा नदी  की सहायक  तुंगभद्रा नदी पर स्थित है | यह कर्नाटक व आंध्र प्रदेश राज्य का संयुक्त उपक्रम है इस परियोजना के अंतर्गत मल्लापुरम में एक बांध बनाया गया है |

               नागार्जुन सागर परियोजना 

        इस परियोजना के अंतर्गत से कृष्णा नदी पर नंदीकोंडा  के पास एक बांध बनाया गया है इससे जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री नामक नहरे निकाली गई है |

                   गंडक परियोजना 

 यह उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों की संयुक्त परियोजना है जिसका कुछ लाभ नेपाल को भी दिया जा रहा है |

                     व्यास परियोजना 

 यह परियोजना पंजाब ,हरियाणा और राजस्थान राज्य की सम्मिलित परियोजना इसके अंतर्गत इंदिरा गांधी नहर में जाड़े के समय में नियमित जलापूर्ति बनाए रखने के लिए व्यास नदी पर धौलाधार पहाड़ियों में पोंग बांध बनाया गया है |

                    मयूराक्षी  परियोजना 

 मयूराक्षी हुगली की सहायक नदी है इसमें मयूराक्षी नदी पर कनाडा बांध बनाया गया है इससे पश्चिम बंगाल एवं झारखंड राज्य  लाभान्वित हो रहा है  |

               इंदिरा गाँधी नहर परियोजना 

 इंदिरा गांधी नहर परियोजना भारत की एक बहुत बड़ी सिंचाई परियोजना है इसके लिए ब्यास  तथा सतलुज नदी पर बने हरिके बैराज से जल दिया जा रहा है |

                     नर्मदा घाटी परियोजना 

 इसके अंतर्गत गुजरात सरदार सरोवर परियोजना व नर्मदा सागर परियोजना सम्मिलित है इस परियोजना से मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य लाभान्वित होगा |

                 टिहरी बांध परियोजना

 इस बांध का निर्माण भागीरथी और भील गंगा के संगम के नीचे उत्तराखंड के टिहरी जिले में किया गया है |

                             उर्वरक ....

 रासायनिक उर्वरक आधुनिक कृषि का दूसरा अवलंब है भारतीय परिपेक्ष में तो यह  और भी महत्वपूर्ण हो जाता है | वस्तुत: भारत की जलवायु उष्ण कटिबंधीय होने के कारण यहां की मृदा में सार्वभौमिक रूप से नाइट्रोजन की कमी पाई जाती है | जो कि  उर्वरकता  निर्धारण में महत्वपूर्ण कारक है | उर्वरक के समुचित प्रयोग से प्रति हेक्टेयर उत्पादन में 30% तक वृद्धि हो सकती है | यही कारण है कि नियोजित विकास की रणनीति के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर उर्वरक संयंत्र की स्थापना के साथ-साथ सरकार ने इसके आयातो को बढ़ावा दिया है | इसकी सुविधा आम आदमी तक पहुंचाने के लिए सरकार ने सब्सिडी  देने , रियायती ऋण ऋण देने तथा स्थानीय स्तर पर वितरण केंद्र खोलने ,मृदा परीक्षण केंद्र खोलने के कदम उठाया है |

              भारत में उर्वरक की खपत

 भारत में प्रति हेक्टेयर  उर्वरक की खपत की मात्रा मात्र वर्ष 1951 के  मात्र आधा की किलोग्राम से बढ़कर वर्तमान में 125.39 किग्रा प्रति हेक्टेयर पहुंच गई है | परंतु यह  विश्व के विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है | उर्वरक की खपत हर राज्य में अलग-अलग है शुष्क  कृषि क्षेत्रों में जहां सिंचाई की सुविधा संतोषप्रद नहीं है |इसकी खपत कम पाई जाती है | देश का 60% कृषि क्षेत्रफल और वर्षा पर आधारित कृषि  के अंतर्गत आता है | लेकिन  इसके अंतर्गत केवल 20%  उर्वरक की खपत होती है |

 कृषि में रासायनिक उर्वरकों की तीन किस्में  में नाइट्रोजन , फास्फोरस तथा पोटाश  का प्रयोग 4:2: के अनुपात में किया जाना चाहिए किंतु भारत में यह अनुपात काफी असंतुलित हो गया है | भारत में हरित क्रांति के प्रारंभ के बाद उर्वरकों का अनियंत्रित इस्तेमाल भी प्रारंभ हो गया जिसके दुष्परिणाम  देखने को मिल रहे हैं |

                              बीज ..

 कृषि में बीज की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि बीज  ही  वह साधन है जो पुनरुउत्पादन के लिए जिम्मेदार होता है  | पूर्व में सामान्यतया कृषक बीज  के रूप में अपने उत्पादित फसल का ही एक भाग उपयोग में लाया करते थे | आज वर्तमान में बीज  की संकल्पना बदल गई है | आज विभिन्न रूप से संवर्धित एवं  परिवर्धित बीज का व्यापक प्रचलन भारतीय आधुनिक कृषि की प्रमुख विशेषता हो गई है | जिसके कारण कई उन्नत किस्म के बीज प्रचलन में आया है |

                     उन्नत किस्म के बीज

 उत्तम प्रकार के बीजों से तात्पर्य न  केवल उच्च  उत्पादक प्रकार से है बल्कि लघु संवर्धन काल वाले बीज तथा  आर्द्रता तथा कीट प्रतिरोधक क्षमता वाले बीजो से भी है | भारत की भौतिक परिस्थिति की पृष्ठभूमि में सूखा व जल अधिकता की स्थिति में उत्तम प्रकार के बीज अत्यंत आवश्यक है | इस  बीजों के उपयोग से न केवल कृषि उत्पादन में आशातीत वृद्धि बल्कि पौधों की जैविक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए जा सकते हैं | भूमंडलीय तापमान को देखते हुए भी इसका प्रयोग अनिवार्य होता जा रहा है | तीसरी पंचवर्षीय योजना से ऐसे बीजों पर ध्यान देना शुरू किया गया सघन  कृषि विकास कार्यक्रम में हरित क्रांति के माध्यम से प्रारंभ में में आयात द्वारा इसकी मांग पूर्ति की गई | किंतु स्थाई समाधान के लिए देश में अनुसंधान व विकास को बढ़ावा दिया गया और अनेक फसलों के उन्नत बीज प्राप्त करने में सफलता भी मिली  इन बीजों के प्रयोग से राष्ट्रीय स्तर पर प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिली |

                 राष्ट्रीय बीज नीति 2002

 भारत में एम वी  राव समिति की अनुशंसा पर  जून   2002 में नई बीज नीति घोषित की गई इस नीति के अंतर्गत कृषि का उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने में जैव प्रौद्योगिकीय   तकनीकों के महत्व को स्वीकार किया गया | इस नीति के अंतर्गत बीजों के विकास हेतु जैव प्रौद्योगिकीय  तकनीकों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया | इसके अलावा नई तकनीकों द्वारा बीजों का उत्पादन , इसका विपणन , आयात निर्यात आदि के नियमन का भी प्रावधान इस नीति के अंतर्गत किया गया है |

                   कृषि में वाणिजियक  शक्ति

 कृषि क्षेत्र में ऊर्जा खपत में वृद्धि से कृषि उत्पादन में वृद्धि , कृषि उपज के सुरक्षित भंडारण उसका प्रसंस्करण व  बाजार पहुँच  सुनिश्चित होती है कटाई के बाद फसलों के उचित भंडारण से फसलों की बर्बादी नहीं होती है | जिससे फसलों के  उपलब्धता बढ़ जाती है विभिन्न सरकारी प्रयासों के माध्यम से कृषि में ऊर्जा की खपत बढ़ाने के लिए कई पर कार्यक्रम चलाए गए हैं | इसके अंतर्गत विभिन्न बहुउद्देशीय परियोजनाओं के माध्यम से जल विद्युत की उपलब्धता को बढ़ाया गया है |

 वर्तमान में देश की कुल ऊर्जा खपत का 20.43% कृषि क्षेत्र में होता है | जबकि वर्ष 1950- 51 में यह आंकड़ा मात्र 3.9% का था हालांकि राज्यों के स्तर  पर ऊर्जा खपत में काफी की विषमता  पाई जाती है |

                     कृषि यांत्रिकीकरण

 कृषि कार्यों में यंत्रों के प्रयोग को कृषि यांत्रिकीकरण कहा जाता है | जिसे समय की बचत उत्पादन , लागत कम करने और कृषि उत्पादन बढ़ाने  मैं मदद मिलती है प्रमुख कृषि उपकरणों में ट्रैक्टर , थ्रेसर , ट्रेलर , हार्वेस्टर प्रमुख है | लेकिन भारतीय किसानों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले कृषि उपकरणों और औजार पुराने  और  प्रचलित भी हो गए हैं जिससे आधुनिक कृषि के विकास में अवरोध हो रहा है |

 भारत सरकार सब्सिडी , ऋण आदि के माध्यम से कृषि यांत्रिकीकरण को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है | इन सबके अलावा उचित भंडारगृह  की व्यवस्था , यातायात के साधनों का विकास , ऋण  एवं पूंजी प्रदान करने वाली संस्थाएं , सरकारी नीतियां , जमीन सुधार आदि कई  कारक है जिस पर कृषि निर्भर है |

                               कीटनाशक

 हरित क्रांति के बाद भारतीय कृषि में कीटनाशक एवं पीड़कनाशक  का उपयोग काफी बढ़ा  है | जो खरपतवार के  साथ-साथ विभिन्न आवांछनीय  कीड़े - मकोड़े आदि  को मारकर कृषि की उत्पादन बढ़ाने में सहायक है | 

                     (2)  संस्थागत कारक

 आधुनिक भारतीय कृषि में उपज और उत्पादकता प्रत्यक्ष रूप से संस्थागत कारकों से प्रभावित होती है | आधुनिकीकरण के इस दौर में किसानों को विपणन , भंडारण , बैंकिंग और सहकारिता की उपलब्धता  अनिवार्य सी लगती है | ऐसा इसलिए क्योंकि परंपरागत रूप से कृषक को उपरोक्त कारको के आधुनिकीकरण के दौर में बहुत ही आवश्यकता है | जो व्यक्तिगत एवं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं हो पाता है इसलिए कृषि में संस्थागत विकास की अनिवार्यता बहुत ही अहम लगती है |

             भारत में हरित क्रांति

 भारत में वर्ष 1966 से खरीफ मौसम में नई कृषि नीति अपनाई गई जिसे आधुनिक उपज देने वाली किस्मों का कार्यक्रम के नाम से पुकारा गया |वर्ष  1967-86 में   खाद्यान्नों के उत्पादन में वर्ष 1966- 67 की तुलना में लगभग  25% की वृद्धि हुई | यह वृद्धि  इससे पहले कि योजना  काल के 16 वर्षों में होने वाले परिवर्तनों की अपेक्षा कहीं अधिक  तथा तीव्र थी अधिक वृद्धि का होना वास्तव में एक क्रांति के समान ही था | अतः इस वृद्धि  को हरित क्रांति कहा गया  

     हरित क्रांति की मुख्य विशेषता

    हरित क्रांति की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है

 अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग

 उर्वरकों का अधिक प्रयोग 

सिचाई में विस्तार 

कीटनाशक औषधियों का प्रयोग

 आधुनिक कृषि यंत्रों का प्रयोग

 बहु फसल पद्धति का प्रयोग

 ऋण सुविधाओं का विस्तार

 मृदा परीक्षण कार्यक्रम की शुरुआत

 भू संरक्षण पर बल

 ग्रामीण विद्युतीकरण 

बिक्री  संबंधी सुविधाओं का विकास

 सरकार द्वारा फसलों की कीमत का निर्धारण

 हरित क्रांति सीमित फसलों एवं सीमित प्रदेशों में ही लागू की जा सके जिससे क्षेत्रीय एवं  व्यक्तिगत विषमताओं को बढ़ावा दिया मशीनों की अधिक प्रयोग के कारण बेरोजगारी बढ़ी |  उर्वरको एवं सिंचाई के अनियंत्रित प्रयोग से जमीन की उर्वरता कम हुई तथा कई जगह जलजमाव की समस्या पैदा होने लगी इन सब कमियों को देखते हुए वर्ष 2006 में द्वितीय हरित क्रांति इंद्रधनुषीय  क्रांति का आवाहन किया गया |

    भारतीय कृषि की समस्याओं के बारे में बताएं .......

 भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याएं निम्नलिखित है

                       जीवन निर्वाह कृषि

जीवन निर्वाह कृषि भारतीय  कृषि की सबसे बड़ी समस्या है | यहां की आधे से अधिक जनसंख्या कृषि एवं उनसे जुड़े क्रियाकलापों से अपना जीवन यापन करती है | लेकिन इतने मानव संसाधनों के प्रयोग के बावजूद हमारी शकल  घरेलू आय में कृषि का योगदान लगभग 17.4% है इसका मुख्य कारण भारतीय कृषि का जीवन निर्वाह प्रधान होना है |

           कृषि पर जनसंख्या का भारी दबाव 

 अत्यधिक जनसंख्या और अपेक्षाकृत कम कृषि भूमि के कारण कृषि पर जनसंख्या का भारी दबाव पड़ रहा है | जिसके कारण यंत्रीकरण को बढ़ावा नहीं मिल पाता है और उत्पादन कम होता है |

                   जोतों का छोटा होना

 सामाजिक व्यवस्था के कारण जोत क्रमशः  से छोटी होती जा रही है जिसका प्रतिकूल असर कृषि उत्पादन व उत्पादकता पर पड़ता है |

                    मिट्टी का कम उर्वर होना

 लगातार एक ही भूमि पर खेती किए जाने के कारण धीरे-धीरे जमीन की उत्पादकता कम होने लगती है |

                           मृदा अपरदन .

 भारत में मानवीय और पर्यावरणीय कारणों से मृदा अपरदन एक बड़ी समस्या बनती जा रही है जिसके कारण कृषि  पर असर पड़ रहा है |

             सिंचाई की सुविधाओं का अभाव

 भारतीय किसान आज भी अधिकांशत: वर्षा के जल पर सिंचाई के लिए निर्भर है जो एक बहुत बड़ी समस्या है जिसका सीधा असर कृषि  पर पड़ता है |

       किसानों का भाग्यवादी एवं रूढ़िवादी होना

 बहुत से भारतीय किसान रूढ़िवादी होने के कारण कृषि के नए ढंग को आसानी से नहीं अपनाते इसके अलावा भारतीय किसान अशिक्षित तथा अप्रशिक्षित भी है | जिसके कारण कृषि के विकास में बाधा आती है |

                         प्रादेशिक असंतुलन

 हरित क्रांति के बाद उसके असंतुलित प्रभाव के कारण होने वाला प्रादेशिक  असंतुलन भी भारतीय कृषि की समस्या बन चुका है |

         कृषि संबंधित अन्य गतिविधियों के बारे में लिखें .......

 बढ़ती जनसंख्या तथा कृषि के व्यापारी करण के कारण हाल के वर्षों में कृषि संबंधी क्रियाओं का महत्व बढ़ गया है | विशेषकर  सीमांत और गरीब किसानों तथा भूमिहीन मजदूरों के लिए यह तो वरदान साबित हुई है यही कारण है कि ग्रामीण विकास परियोजनाओं में इन्हे  विशेष महत्व दिया जा रहा है |  इन क्रियाओं में बागवानी , पशुपालन, मत्स्य पालन ,रेशम उत्पादन , कुकुट पालन  ,मधुमक्खी पालन आदि सम्मिलित है |

                         रेशम उत्पादन 

 रेशम का उत्पादन रेशम के कीड़ों द्वारा प्राप्त किया जाता है यह रेशम के कीड़ों  शहतूत , महुआ , साल , कुसुम  आदि वृक्षों की पत्तियों पर पाले जाते हैं | विश्व में रेशम उत्पादन में भारत का दूसरा स्थान है यहां विश्व का 17%  रेशम पैदा किया जाता है | भारत में चारों प्रकार का रेशम उत्पादन होता है | मलबरी , टसर , मूंगा , ईरी | रेशम के उत्पादन में कर्नाटक का प्रथम स्थान है | जिसके बाद  क्रमश: आंध्र प्रदेश  पश्चिम बंगाल  तमिलनाडु , असम आता है | ये 5 राज्य मिलकर देश का लगभग 90% रेशम का उत्पादन करता है |

                        पशुपालन

 भारत में विश्व के सबसे अधिक मवेशी है विश्व की कुल भैंसों का  57% और गाय बैलों का 15% भारत में वर्ष 2012 की पशुगणना के अनुसार देश में कुल 52.20 करोड़  मवेशी है | ये  मवेशी देश की कृषि के मेरुदंड है | और देश के सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान 1.6% है | योजना आयोग द्वारा भारत को 15 कृषि जलवायु क्षेत्रों में विभाजित किया गया है जिसमें से 6 क्षेत्र पशुपालन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है | पशुओं की संख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है | इसके बावजूद भारत का पशुपालन उद्योग पिछड़ी अवस्था में है | पिछड़ी अवस्था होने का प्रमुख कारण है | उष्ण  जलवायु , अच्छी नस्ल का आभाव , जीवन निर्वाह के रूप में पशुपालन को अपनाना , सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताएं तथा मांस की मांग का कम होना आदि |

                       दुग्ध  उत्पादन

 भारत विश्व में देश का सबसे बड़ा उत्पादक देश है जो विश्व के 18.5%  दूध का उत्पादन करता है दूध का उत्पादन  वर्ष 1950-51 के 17  मिलियन टन  से बढ़कर वर्ष 2014-15 तक 116.3  मिलियन टन हो  गया है | जिसमें  भैंस द्वारा 53.33% गाय द्वारा 41.47% और बकरियों द्वारा 3.71% का योगदान  किया गया देश के दूध उत्पादन में उत्तर प्रदेश का प्रथम स्थान है | जिसके बाद राजस्थान व  आंध्र प्रदेश का स्थान है |

        देश में दूध उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि को श्वेत क्रांति के नाम से जाना जाता है नेशनल डेहरी डेवलपमेंट जिसके अध्यक्ष वर्गीज कुरियन थे में वर्ष 1970 में ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम लागू किया जो  विश्व का सबसे बड़ा डेयरी विकास कार्यक्रम था इसे तीन  चरणों में लागू किया गया |

           ऑपरेशन फ्लड I ,  डॉ वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम के अंतर्गत वर्ष 1970 में यह कार्यक्रम शुरू किया गया यह कार्यक्रम 10 राज्यों में शुरू किया गया जिसके अंतर्गत 17 फिडर डेयरियांँ स्थापित की गई  पहले से स्थापित डेयरियो का विस्तार किया गया तथा दिल्ली , कोलकाता , मुंबई और चेन्नई में चार मदर डेयरी स्थापित की गई |

       ऑपरेशन फ्लड II  इसका उद्देश्य 144 अतिरिक्त नगरों में मार्केट को व्यवस्थित करना चारे की उपयुक्त व्यवस्था करना तथा पशुओं में बीमारियों की रोकथाम करना था |

        ऑपरेशन फ्लड III  का उद्देश्य राज्यों के 250 जिलों में 170 दूध केंद्र स्थापित करना था | ऑपरेशन फ्लड एकीकृत कार्यक्रम है | जिसमें 65092  डेयरी सहकारिता समितियों से 83.5 लाख  किसानों को लाभ पहुंचाया गया  इससे किसानों को आय का  सुनिश्चित साधन मिल गया |

                         मत्यिस्की 

 भारत की जनसंख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है | और इसका कारण हमारा कृषि  संसाधन हमारी बढ़ती हुई जनसंख्या  की मांग को पूरा करने में असमर्थ है | ऐसी परिस्थिति में मात्स्यिकी  की उद्योग का महत्व बढ़ता जा रहा है | मछली के प्रयोग से हमें पौष्टिक आहार मिलता है | इसमें प्रोटीन अधिक होता है | विटामिन व कार्बोहाइड्रेट होते हैं | अधिकांश भारतीयों के भोजन में प्रोटीन की कमी होती है |जो मछली के आहार  से पूरी हो सकती है |

                      कुकुट पालन

 कुकुट पालन के अंतर्गत मुर्गी , बत्तख,  तीतर ,, बटेर , हंस या ताल   मयूर आदि का मीट ,  अंडा एवं पंखों के लिए प्रजनन किया जाता है इसमें बहुत छोटी लागत से कम समय में गांव में लोगों को रोजगार दिया जा सकता है | एवं उसकी आय में वृद्धि की जा सकती है | कुक्कुट उद्योग पर्यावरण में अभिक्रियाशील नाइट्रोजन यौगिक को  विमुक्त करती है |

 पोल्ट्री के अवशिष्ट से वातावरण में नाइट्रोजन गैस का संलयन बढ़ता है | मुर्गियों की सबसे बड़ी संख्या आंध्र प्रदेश में पाई जाती है जिसके बाद तमिलनाडु ,पश्चिम बंगाल , महाराष्ट्र , कर्नाटक ,असम ,  उड़ीसा , झारखंड , बिहार एवं  हरियाणा का स्थान आता है |